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Showing posts from March, 2026

कभी दुनिया का अजूबा थी... आज बदहाली का शिकार है: फतेहपुर शेखावाटी की 'नवाब अलफ खां की बावड़ी'

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2026 में फतेहपुर शेखावाटी बावड़ी की एक फोटो  फतेहपुर शेखावाटी कस्बा राजस्थान के हेरिटेज शहरों  में शुमार है और यहां की विश्व प्रसिद्ध वास्तुकला की वजह से इसे ' Open Art Gallery' भी कहा जाता है। पर क्या आप जानते हैं कि फतेहपुर शेखावाटी में मध्यकाल की वास्तु और स्थापत्य कला का एक ऐसा नमूना मौजूद है, जो किसी अजूबे से कम नहीं है। जी हां! हम बात कर रहे हैं फतेहपुर शेखावाटी की 'नवाब अलफ खां की बावड़ी'  ( Nawab Alaf Khan ki Bawri) की, जिसे सन् 1614 ईस्वी में नवाब अलफ खां के बेटे दौलत खां ने बनवाया था। यह बावड़ी शेखावाटी में 'नवाबी बावड़ी' के नाम से प्रसिद्ध है। The Famous Fatehpur Shekhawati Stepwell यह बावड़ी अपने आप में इतनी अनूठी थी कि इतिहासकारों ने इसे दुनिया के 17 अजूबों में शामिल किया था। फतेहपुर के बावड़ी गेट क्षेत्र का नाम भी इसी बावड़ी के नाम पर पड़ा है। फतेहपुर बावड़ी एक अजूबा कैसे थी? बावड़ी का निर्माण नागौर के एक कारीगर शेख महमूद द्वारा किया गया था। अंदर से इसका पूरा ढांचा एक भूल-भुलैया जैसा बनाया गया था। ऐसा कहा जाता है कि इसके अंदर से एक सुरंग का रास्...

छोटे शहरों की राजनीति: क्या विचारधारा से ज्यादा धन बल, स्थानीय प्रभाव और पहचान मायने रखते हैं?

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भारत में राजनीतिक पार्टियां अपने सांसद, विधायकों और स्थानीय स्तर पर पार्षदों को अपनी विचारधारा के बलबूते खुद से जोड़ क्यों नहीं पातीं? क्यों पार्टी का टिकट नहीं मिलने पर चुनावी उम्मीदवार दूसरी पार्टी से जुड़ जाते हैं? क्या राजनीतिक पार्टियां केवल विधायकों और सांसदों की संख्या गिनती हैं? अगर ऐसा नहीं है, तो क्यों विधायक एवं सांसद के स्तर पर पार्टियों की विचारधाराएं फीकी पड़ जाती हैं? क्या स्थानीय राजनीति में विचारधारा का महत्व कम हो रहा है। संसद और विधानसभा चुनावों में छोटे शहरों और कस्बों का ही योगदान होता है। यहां से चुने गए सांसद और विधायक ही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की सरकार बनाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि उन छोटे शहरों और कस्बों की राजनीति किस तरह काम करती है, जहां से बिना किसी विचारधारा के दम पर सांसद और विधायक चुनकर आते हैं और इनकी संख्या गिनकर पार्टियां अपनी विचारधारा की सरकार बना लेती हैं। विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं कौनसी हैं? जब से दुनिया में democracy की बात हो रही है, तभी से इसे लागू करने के विचार भी जन्म लेते रहे हैं। ये विचार...

क्या खेतड़ी (झुंझुनू) के महाराजा के बिना स्वामी विवेकानंद को दुनिया जान पाती? | Would the World Have Known Swami Vivekananda Without the Maharaja of Khetri (Jhunjhunu)

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Photo: Swami Vivekananda and Maharaja Ajit Singh of Khetri  पूरा विश्व आज स्वामी विवेकानंद के नाम से परिचित है। स्वामी विवेकानंद भारत के एक ऐसे युवा सन्यासी थे जिन्होंने हिंदू धर्म के विचारों को पूरी दुनिया में पहुंचाया। अमेरिका के शिकागो में हुए 'विश्व धर्म सम्मेलन' ( Parliament of the World's Religions ) में स्वामी विवेकानंद द्वारा जो व्याख्यान दिया गया था, उसने पूरी दुनिया को हिन्दू धर्म, भारतीय संस्कृति और सभ्यता से परिचित करवाया। पर क्या हम जानते हैं कि स्वामी विवेकानंद के जीवन और उनकी इन उपलब्धियों में राजस्थान के खेतड़ी (झुंझुनूं) के महाराजा अजीत सिंह का कितना बड़ा योगदान है? इस व्याख्यान के बाद स्वामी विवेकानंद भी पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो गए। कौन थे खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह अजीत सिंह का जन्म सन् 1861 में झुंझुनू के अलसीसर में हुआ। सन् 1870 से लेकर 1901 तक उन्होंने खेतड़ी रियासत पर शासन किया। महाराजा अजीत सिंह कला एवं विज्ञान प्रेमी थे और खगोल विज्ञान का भी समझ रखते थे। स्वामी विवेकानंद को भी उन्होंने खगोल विज्ञान सिखाया था। वे बहुत ही काबिल शासक थे और उन्होंन...

फतेहपुर के दानवीर सेठ सोहनलाल दूगड़: जिन्हें दान किए बिना चैन नहीं मिलता था। | The Philanthropist Seth Sohanlal Dugar of Fatehpur: A Man Who Found No Peace Without Giving

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Photo: Sohanlal Lal Dugar ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो बिना किसी शोर-शराबे के समाज के लिए बहुत कुछ कर जाते हैं। बात करते हैं ऐसी ही  एक महान शख्सियत के बारे में, जिन्होंने जनसेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया। ये कोई नेता नहीं थे और न ही इनकी जनसेवा नेताओं जैसी थी। हम बात कर रहे हैं राजस्थान के सीकर जिले के फतेहपुर कस्बे के नामी सेठ सोहनलाल दूगड़ की। सेठ सोहनलाल दुगड़ का जन्म 20 जून 1895 को उस समय के सीकर ठिकाने के एक छोटे से कस्बे फतेहपुर में हुआ था। बचपन ( Childhood ) सोहनलाल का बचपन बड़ा अभावग्रस्त रहा। पैसों की तंगी के कारण कोई औपचारिक शिक्षा नहीं हो पाई और केवल पारंपरिक गुरुओं से ही थोड़ा-बहुत सीखा। गुरु शिक्षा में उनका अधिक मन नहीं लगता था और अधिक समय मोहल्ले के बालकों के साथ गुच्छी और चरभर (पारंपरिक खेल) खेलने में निकलता था। चरभर के खेल में पैसे भी लगाए और सट्टे से पैसे कमाने का लोभ जग गया। परिवार अभावग्रस्त था, इसलिए पैसों का लोभ स्वाभाविक था। एक-दो बार चरभर में पिताजी के पैसे हार गए, तो मार भी पड़ी। एक धनी परिवार के संपर्क में आकर वे कलकत्ता गए और कुछ हासिल किए बिना वाप...

क्या RSS का हिंदुत्व और हिन्दू धर्म एक ही हैं, या दोनों अलग है? | Are RSS Hindutva and Hinduism the same, or are they different?

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हिंदुत्व बनाम हिंदू धर्म   आइए एक छोटी सी कहानी से समझने कि कोशिश करते हैं कि आखिर हिन्दू धर्म और हिंदुत्व में क्या फर्क है। बबलू आज स्कूल से जल्दी आ गया था। मन को थोड़ा हल्का करने के लिए वह अपने मोहल्ले की चाय की थड़ी पर जाकर बैठ गया। लेकिन आज माहौल कुछ अलग था… थड़ी पर काफी गर्मा गर्मी थी। गरम सिंह और नरम सिंह के बीच तगड़ी बहस चल रही थी। गरम सिंह RSS के हिंदुत्व को लेकर अपनी बात रख रहा था, जबकि नरम सिंह हिन्दू धर्म की बात कर रहा था। दोनों की बातें सुनकर बबलू कन्फ्यूज हो गया। 🤔 उसके मन में सवाल उठा -- “RSS का हिंदुत्व और हिन्दू धर्म… क्या ये दोनों एक ही हैं?” बबलू अब दोनों की बात ध्यान से सुनने लगा। नरम सिंह कह रहा था -- मैं सनातनी हिन्दू हूं… हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन जीने की कोशिश करता हूं। हिन्दू धर्म एक जीवन शैली है, और हिन्दू होना एक व्यक्तिगत मामला है। धर्म सामूहिक नहीं हो सकता, यह तो व्यक्तिगत मामला है। समूह का तो संप्रदाय होता है। मैं गीता, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र जैसे ग्रंथों को पढ़कर जीवन के गूढ़ प्रश्नों के उत्तर खोजने की कोशिश करता हूं। गरम सिंह अपनी बात जोर से रखता है ...

बबलू चला वोट डालने: क्या वह सच में लोकतंत्र को समझता है? | Bablu Goes to Vote: Does He Really Understand Democracy?

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भाईसाहब! आज लोकतंत्र का पर्व है… 🇮🇳 और बबलू पहली बार वोट डालने जा रहा है। उसे लग रहा है कि आज वह देश बदलने निकला है। अब बबलू अपने मोहल्ले के मतदान केंद्र की ओर बढ़ रहा है। उसके चेहरे पर उत्साह है… और मन में एक अजीब सा गर्व। रास्ते में उसे उसके क्षेत्र के एक पत्रकार महोदय मिल जाते हैं। पत्रकार मुस्कुराकर पूछते हैं -- “तुम्हारे इलाके की सबसे बड़ी समस्याएं क्या हैं?” बबलू बिना सोचे बोलना शुरू करता है -- “पानी की किल्लत है… नालियां रुकी हुई हैं… जगह-जगह जलभराव है… सड़कें भी टूटी हुई हैं…” पत्रकार फिर पूछते हैं -- “तो तुम किस पार्टी को वोट दोगे?” बबलू तुरंत जवाब देता है -- “बवंडर पार्टी को।” पत्रकार फिर पूछते हैं -- “क्यों? बवंडर पार्टी ही क्यों?” बबलू सहज होकर कहता है -- “हम तो हमेशा से उसी को वोट देते आए हैं… पापा भी उसी को देते हैं, भैया, बहन, मम्मी, चाचा-चाची… मेरे दादाजी और दादी भी इसी पार्टी को वोट देते आए हैं… और हमारे पड़ोसी भी सालों से इसी को वोट डालते आ रहे हैं। हमारा पूरा माहौल ही ऐसा है।” पत्रकार कुछ देर चुप रहते हैं, फिर गंभीर होकर पूछते हैं -- “क्या तुमने स्कूल में लोकतंत्र ...

क्या भारत में लोकतंत्र वास्तव में सफल है? | Is democracy truly successful in India?

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Photo: A Statue of B.R. Ambedkar क्या केवल वयस्क मताधिकार देने भर से लोकतंत्र का कार्य पूरा हो जाता है, या लोकतंत्र का कोई अधिक विकसित रूप भी हो सकता है? क्या भारत में हर एक मतदाता अपने मत की कीमत समझता है, या केवल बहकावे में आकर अपना मत कहीं भी उपयोग कर लेता है? क्या भारत में आम आदमी की आवाज़ सत्ता तक पहुंचती है, या उसके कीमती वोट का उपयोग केवल सत्ता हासिल करने के लिए किया जा रहा है? आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनकर उभर रहा है, पर क्या यहां लोकतंत्र वास्तव में सक्रिय है या केवल एक व्यवस्था बनकर रह गया है? लोकतंत्र क्या है? ( What is Democracy? ) लोकतंत्र का सामान्य अर्थ होता है— "जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए बनाया गया तंत्र"। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता ही सर्वोपरि होती है एवं जनता का ही शासन स्थापित किया जाता है। लोकतंत्र का शुद्ध रूप "प्रत्यक्ष लोकतंत्र" होता है, जिसमें सीधे जनता ही शासन एवं नीतियों से संबंधित निर्णय लेती है, परंतु व्यवहार में ज्यादातर लोकतंत्र की जो व्यवस्था अपनाई जाती है, वह "प्रतिनिधि लोकतंत्र" होती है। प्रतिनिधि...

नाथ संप्रदाय | नाथ पंथी | कनफटा योगी | Nath Sampradaya | Nath Panthis | Kanphata Yogi

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Painting of Gorakhnath  नाथ संप्रदाय एक ऐसा संप्रदाय है जो संपूर्ण भारत के गांव-गांव तक फैला हुआ है। लगभग हर गांव में नाथ योगियों एवं उनके आश्रमों को देखा जा सकता है। नाथ परंपरा हिंदू धर्म की शैव परंपरा से जुड़ी हुई है और यह मुख्यत: भारत और नेपाल से संबंधित है। वैसे नाथ संप्रदाय की जड़ें प्राचीन सिद्ध परंपरा में पाई जाती हैं। जब भी नाथ योगियों की बात की जाती है तो चौरासी सिद्ध एवं नव नाथ का उल्लेख होता है, और इस प्रकार नाथ और सिद्ध आपस में जुड़े हुए हैं। नाथ योगी भगवान शिव को अपना प्रथम गुरु मानते हैं और उन्हें आदिगुरु ( Adiguru ) कहते हैं। आदिगुरु के अलावा नव नाथ (नौ नाथ) भी नाथ योगियों के मुख्य गुरु माने जाते हैं, जिनमें 9 वीं शताब्दी के योगी मत्स्येंद्रनाथ प्रमुख हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में नाथ पंथ का जो वर्तमान विचार एवं संगठन है, उसकी नींव महायोगी गोरखनाथ द्वारा रखी गई थी, इसलिए गोरखनाथ को नाथ संप्रदाय का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है। योगी मत्स्येंद्रनाथ ( Yogi Matsyendranatha ) ऐसी मान्यता है कि जब नौका में बैठे भगवान शिव देवी पार्वती को तत्वज्ञान समझा रहे थे, तब पार्वती को ...

श्री अरविंद: एक क्रांतिकारी से दार्शनिक बनने का सफर | Sri Aurobindo: The Journey From a Revolutionary to a Philosopher | Sri Aurobindo Gosh

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Photo: Shri Aurobindo भारत की 20 वीं सदी महापुरुषों की सदी रही है और श्री अरविंद (Sri Aurobindo)  को भी उन्हीं महापुरुषों में गिना जाता है। सन 1872 में कलकत्ता में जन्मे अरविंद घोष का जीवन अत्यंत उतार-चढ़ाव वाला रहा है और उनकी पूरी जीवन-यात्रा विविधताओं से भरी हुई है। बचपन में अंग्रेजी माहौल में लालन-पालन और पढ़ाई-लिखाई से लेकर जवानी में भारतीय सिविल सेवा की कठिन परीक्षा पास करने तक, अरविंद ने जीवन के अनेक चरणों का अनुभव किया। उन्होंने भारत की आज़ादी से जुड़े कार्यों में अपना योगदान दिया और अंत में जीवन का एक लंबा समय अध्यात्म को समर्पित कर दिया। श्री अरविंद के व्यक्तित्व में योगी, कवि और दार्शनिक—तीनों का समन्वय नजर आता है। अरविंद को जेल क्यों जाना पड़ा? भारतीय सिविल सेवा से मोहभंग होने के बाद कुछ समय तक अरविंद ने बड़ौदा राज्य में अपनी सेवाएं दीं। अपनी राज्य-सेवाओं के दौरान ही वे राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ने लगे थे। सन् 1905 में बंगाल के विभाजन के विरोध में क्रांतिकारियों के समूह में अरविंद भी सक्रिय रूप से शामिल थे और वे अंग्रेजों की नजर में आ चुके थे। सन् 1908 में दो क्रां...

क्या धर्म के नाम पर राजनीति लोकतंत्र के लिए खतरा है? | Is politics in the name of religion a threat to democracy?

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दुनिया में राजनीति और धर्म के आपसी संबंध की बात की जाए तो प्राचीन काल से ही राजनीति पर धर्म का व्यापक प्रभाव रहा है। मध्यकालीन युग में भी दुनिया के शासकों ने धार्मिक संस्थानों की छाया में शासन किया है। भारत में भी जिस समय जो धर्म अधिक प्रभाव में रहा, उसी को मानने वाले शासक सत्ता में आए और उसी प्रकार उनकी नीतियां रहीं। दुनिया में जब भी लोकतंत्र की बात की जाती है, तो एक प्रश्न हमेशा सामने आता है कि क्या किसी धर्म विशेष के नाम पर राजनीति करना और सत्ता हासिल करना लोकतंत्र को कमजोर करता है। दुनिया में धार्मिक सत्ता प्राचीन मिस्र, मेसोपोटामिया और रोम के शासक स्वयं को ईश्वर का रूप मानते थे। जापान में भी सम्राट स्वयं को देवता मानते थे। भारत की बात करें तो राजा स्वयं को धर्म का रक्षक मानते थे। मध्यकाल में यूरोप में चर्च के पास भी राजनीतिक शक्ति थी, जबकि मध्यपूर्व में खिलाफत व्यवस्था के माध्यम से सत्ता चलाई जाती थी। इब्राहिमी धर्मों (इस्लाम, ईसाई, यहूदी) ने भी राजनीति को अत्यधिक प्रभावित किया है। भारत का उदाहरण प्राचीन भारत में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर ही शासन संचालित किया और अ...

भारत में गौ रक्षा की बात क्यों होती है? सच भावना या राजनीति? | Why is Cow Protection Discussed in India? Truth, Sentiment, or Politics?

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आजकल भारत में गौ रक्षा का मुद्दा काफी गर्माया हुआ है। गौ रक्षा के लिए भारत में अलग-अलग संगठन भी काम कर रहे हैं। भारत के गाँव-गाँव में गौ रक्षा की बात हमेशा से होती रही है। गौ रक्षा के मुद्दे को लेकर धर्मगुरुओं और सरकारों के बीच टकराव भी समय-समय पर सामने आते रहते हैं। ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य भी उत्तर प्रदेश सरकार पर गौ हत्या रोकने के लिए दबाव बना रहे हैं। आखिर गायों की रक्षा इतनी आवश्यक क्यों है कि समय-समय पर इसके लिए आवाज उठती रहती है? गौ रक्षा का ऐतिहासिक पहलू प्राचीन भारत में गाय अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख अंग थी। कृषि से संबंधित कार्य नंदी अथवा बैल के बिना लगभग असंभव थे। गाय के दूध और घी का उपयोग घर-घर में परिवार के भरण-पोषण के लिए किया जाता था, जबकि गाय के गोबर का उपयोग ईंधन के रूप में होता था। इस प्रकार गाय प्राचीन भारत में जीवन का एक अभिन्न हिस्सा थी, और जीवनदायिनी होने के कारण इसे माता का दर्जा दिया गया। किसी परिवार के पास जितनी अधिक गायें होती थीं, उसे उतना ही अधिक समृद्ध माना जाता था। राजा-महाराजा भी उपहार के रूप में गौदान किया करते थे। आज भी गाय का दूध और गोबर भारत सहित दुनिय...

क्या दुनिया को आज बुद्ध की शिक्षाओं की जरूरत है? | Relevance of Buddha Teachings Today

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आज दुनिया जटिलता, तनाव और असमानताओं से घिरी हुई है। मध्य-पूर्व में चल रहा युद्ध यह दर्शाता है कि दुनिया में तकनीकी विकास तो बहुत हुआ है, परंतु मनुष्य के भीतर अशांति और असंतोष बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में यह प्रश्न उठता है—क्या बुद्ध की नीतिगत शिक्षाएँ दुनिया में शांति ला सकती हैं? बुद्ध के समय का समाज सिद्धार्थ का जन्म ऐसे समय में हुआ जब भारत छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में बंटा हुआ था। लोभ, लालच और असंतुष्टि के कारण ये राज्य आपस में युद्धरत रहते थे। धार्मिक दृष्टि से उस समय का समाज कर्मकांडों और पाखंडों में उलझा हुआ था। इस प्रकार की सामाजिक जटिलताओं के कारण आम मनुष्य स्वयं को तनावग्रस्त महसूस करता था और अपने जीवन के मार्ग से भटकता जा रहा था। ऐसे सामाजिक रूप से त्रस्त आमजन को शांति का मार्ग दिखाने के लिए सिद्धार्थ ने बुद्ध बनकर अपना नीतिगत दर्शन प्रस्तुत किया। बुद्ध की शिक्षाएँ बुद्ध ने मनुष्य को शांति का मार्ग दिखाने के लिए चार आर्य सत्य (The Four Noble Truths) बताए। उन्होंने कहा कि— जीवन में दुःख है। दुःख के कारण हैं। दुःख के कारणों का निवारण संभव है। इस निवारण के लिए अष्टांगिक मार्ग ...