नाथ संप्रदाय | नाथ पंथी | कनफटा योगी | Nath Sampradaya | Nath Panthis | Kanphata Yogi

Nath Yogi 'Gorakhnath'
Painting of Gorakhnath 

नाथ संप्रदाय एक ऐसा संप्रदाय है जो संपूर्ण भारत के गांव-गांव तक फैला हुआ है। लगभग हर गांव में नाथ योगियों एवं उनके आश्रमों को देखा जा सकता है। नाथ परंपरा हिंदू धर्म की शैव परंपरा से जुड़ी हुई है और यह मुख्यत: भारत और नेपाल से संबंधित है। वैसे नाथ संप्रदाय की जड़ें प्राचीन सिद्ध परंपरा में पाई जाती हैं। जब भी नाथ योगियों की बात की जाती है तो चौरासी सिद्ध एवं नव नाथ का उल्लेख होता है, और इस प्रकार नाथ और सिद्ध आपस में जुड़े हुए हैं। नाथ योगी भगवान शिव को अपना प्रथम गुरु मानते हैं और उन्हें आदिगुरु (Adiguru) कहते हैं। आदिगुरु के अलावा नव नाथ (नौ नाथ) भी नाथ योगियों के मुख्य गुरु माने जाते हैं, जिनमें 9 वीं शताब्दी के योगी मत्स्येंद्रनाथ प्रमुख हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में नाथ पंथ का जो वर्तमान विचार एवं संगठन है, उसकी नींव महायोगी गोरखनाथ द्वारा रखी गई थी, इसलिए गोरखनाथ को नाथ संप्रदाय का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है।

योगी मत्स्येंद्रनाथ (Yogi Matsyendranatha)

ऐसी मान्यता है कि जब नौका में बैठे भगवान शिव देवी पार्वती को तत्वज्ञान समझा रहे थे, तब पार्वती को सुनते-सुनते नींद आ जाती है और नौका के नीचे छिपा हुआ एक मत्स्य सारा ज्ञान सुनकर तत्वज्ञानी बन जाता है। उसी मत्स्य को भगवान शिव जगत कल्याण के लिए मत्स्येंद्रनाथ के रूप में प्रकट करते हैं। योगी मत्स्येंद्रनाथ नाथ पंथ के नव नाथों में से एक हैं एवं गोरखनाथ के गुरु हैं।

महायोगी गोरखनाथ (Mahayogi Gorakhanatha)

भारत में एक कहावत बड़ी प्रसिद्ध है — "गुरु से बड़ा चेला"। गोरखनाथ 11 वीं शताब्दी के एक महान योगी माने जाते हैं। वे नाथ पंथ के ऐसे योगी हैं जिन्होंने भारतवर्ष की वर्तमान नाथ परंपरा की व्यवस्था को संगठित किया। ऐसी मान्यता है कि गोरखनाथ के कोई माता-पिता नहीं थे, बल्कि योगी मत्स्येंद्रनाथ ने गाय के गोबर के ढेर से गोरखनाथ को उत्पन्न किया था। गोरखनाथ की गुरु-भक्ति भक्ति की पराकाष्ठा मानी जाती है।

गोरख की गुरु भक्ति (Guru Bhakti of Gorakh)

ऐसी मान्यता है कि जब योगी मत्स्येंद्रनाथ गृहस्थ बनकर रानी तिलोत्तमा से विवाह कर लेते हैं, तब गोरखनाथ को लगता है कि उनके गुरु अपने साधना मार्ग से भटक गए हैं। अपने गुरु को संसार की मोह-माया से मुक्त करने के लिए गोरखनाथ रानी तिलोत्तमा के राज्य से गुरु को सफलतापूर्वक बाहर ले आते हैं। परंतु यह सब योगमाया थी, जो योगी मत्स्येंद्रनाथ ने गोरखनाथ की परीक्षा लेने के लिए रची थी। मत्स्येंद्रनाथ देखना चाहते थे कि गोरखनाथ को अपने गुरु में कितना विश्वास है। इस प्रकार गुरु के गृहस्थ जीवन अपनाने की घटना से भी गोरखनाथ का अपने गुरु में विश्वास अडिग रहता है।

नाथों का विचार एवं दर्शन (Idea and Philosophy of Naths)

नाथ दर्शन में विचारधारा की अपेक्षा साधना को अधिक महत्व दिया जाता है। नाथ दर्शन शैव, बौद्ध, तंत्र एवं योग का मिश्रण है, और इसमें भक्ति और ज्ञान की अपेक्षा साधना मार्ग को अपनाकर नाथ योगी सिद्धि प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं। नाथ परंपरा का एक महत्वपूर्ण पहलू हठयोग है, जिसके माध्यम से योगी अपने शरीर को शुद्ध करके सिद्धि प्राप्त करता है, जहां आत्मा परम तत्व के साथ एकत्व प्राप्त करती है। शंकर के अद्वैत वेदांत दर्शन का प्रभाव भी नाथ पंथ पर दिखाई देता है।

कान फाड़ना और दीक्षा (Ear Piercing and Initiation

नाथ योगियों की पहचान कनफटा योगियों के रूप में की जाती है। जब किसी व्यक्ति को नाथ परंपरा में दीक्षा दी जाती है, तो उसके दोनों कानों के केंद्रीय भाग को छेदकर उसमें कुंडल पहनाए जाते हैं, जो सांसारिक मोह-माया से मुक्ति एवं वैराग्य का प्रतीक होते हैं। इस प्रकार भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर नाथ परंपरा के साधु कठोर नियमों का पालन करते हैं।

नव नाथ कौन-कौन से हैं? (Who are Nav Naths?)

नव नाथों में नाथ संप्रदाय के नौ मुख्य गुरु माने जाते हैं, जो हैं — मत्स्येंद्रनाथ, गोरखनाथ, जालंधरनाथ, कनीफनाथ, गहिनीनाथ, भर्तृहरिनाथ, रेवणनाथ, चरपटनाथ और नागनाथ। नव नाथ नाथ संप्रदाय की मुख्य पहचान हैं।

राजस्थान का शेखावाटी अंचल और नाथ पंथ (Shekhawati Region of Rajasthan and Nath Panth)

राजस्थान का शेखावाटी क्षेत्र (सीकर, चूरू, झुंझुनू) नाथ योगियों की तपोभूमि के रूप में जाना जाता है। इस क्षेत्र में फतेहपुर के योगी अमृतनाथ, चूरू के भानीनाथ एवं लक्ष्मणगढ़ के रतिनाथ प्रसिद्ध हैं।


जब भी नाथ पंथ की चर्चा होती है, गौ रक्षा के मुद्दे पर भी बात करना जरूरी हो जाता है। भारत में नाथ पंथी लंबे समय से इस विषय को प्रमुखता से उठाते रहे हैं।


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