छोटे शहरों की राजनीति: क्या विचारधारा से ज्यादा धन बल, स्थानीय प्रभाव और पहचान मायने रखते हैं?

भारत में राजनीतिक पार्टियां अपने सांसद, विधायकों और स्थानीय स्तर पर पार्षदों को अपनी विचारधारा के बलबूते खुद से जोड़ क्यों नहीं पातीं?
क्यों पार्टी का टिकट नहीं मिलने पर चुनावी उम्मीदवार दूसरी पार्टी से जुड़ जाते हैं?
क्या राजनीतिक पार्टियां केवल विधायकों और सांसदों की संख्या गिनती हैं? अगर ऐसा नहीं है, तो क्यों विधायक एवं सांसद के स्तर पर पार्टियों की विचारधाराएं फीकी पड़ जाती हैं?
क्या स्थानीय राजनीति में विचारधारा का महत्व कम हो रहा है।
संसद और विधानसभा चुनावों में छोटे शहरों और कस्बों का ही योगदान होता है। यहां से चुने गए सांसद और विधायक ही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की सरकार बनाने के लिए जिम्मेदार होते हैं।
ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि उन छोटे शहरों और कस्बों की राजनीति किस तरह काम करती है, जहां से बिना किसी विचारधारा के दम पर सांसद और विधायक चुनकर आते हैं और इनकी संख्या गिनकर पार्टियां अपनी विचारधारा की सरकार बना लेती हैं।

विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं कौनसी हैं?

जब से दुनिया में democracy की बात हो रही है, तभी से इसे लागू करने के विचार भी जन्म लेते रहे हैं। ये विचार ही अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं के नाम पर सामने आए हैं।
इन विचारधाराओं के बलबूते सरकार बनती और बिगड़ती रहती है, और यही विचारधाराएं किसी देश की दशा व दिशा तय करती हैं।
समाजवाद, साम्यवाद, पूंजीवाद, वामपंथ, दक्षिणपंथ और मध्यपंथ जैसी विचारधाराएं दुनिया में प्रचलित हैं।

भारत की National Politics

भारत में जब भी राजनीतिक मुद्दों पर बात की जाती है, तो विभिन्न political पार्टियों पर चर्चा होती है। पार्टियों को उनकी विचारधाराओं के आधार पर ही परखा जाता है, अर्थात ऐसा माना जाता है कि जिस पार्टी की जैसी विचारधारा होगी, वह वैसी ही नीतियां बनाएगी।
विचारधाराओं के आधार पर राजनीतिक पार्टियां एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप भी लगाती रहती हैं और स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश में लगी रहती हैं।
पर क्या छोटे शहरों में भी ऐसा ही होता है? क्या वहां भी जनता और कोई चुनावी उम्मीदवार समाजवाद, साम्यवाद, वामपंथ और दक्षिणपंथ देखकर ही पार्टियों से जुड़ते हैं, या फिर स्थिति कुछ अलग है?

छोटे शहरों की राजनीति (Local Politics)

छोटे शहरों और कस्बों में आम आदमी विभिन्न political पार्टियों को समर्थन के आधार पर बंटा हुआ तो होता है, लेकिन उसे अपनी पार्टियों की ideology से ज्यादा इत्तेफाक नहीं होता है। यह अक्सर भारत में कस्बों के स्तर पर आसानी से देखा जा सकता है।
किसी क्षेत्र विशेष के चुनावी उम्मीदवार तक भी अपनी पार्टी की विचारधारा से ज्यादा बंधे हुए नहीं होते हैं।
लोकसभा, विधानसभा और निकाय चुनावों में स्थानीय मुद्दों के अलावा उम्मीदवारों का स्थानीय वर्चस्व, उनकी पहचान और वहां की जनता से उनके रिश्ते ही महत्वपूर्ण होते हैं।
इस प्रकार भारत में छोटे शहरों की राजनीति में पार्टियों की विचारधारा का कोई विशेष योगदान दिखाई नहीं देता।

स्थानीय राजनीति में धनबल का प्रभाव 

चुनावों के दौरान पार्टियों की राजनीतिक विचारधारा धनबल के सामने धुंधली पड़ जाती है और टिकट वितरण तक में पैसों का प्रभाव दिखाई देता है।
यहां तक कि चुनाव हो जाने के बाद भी सरकार बनाने के लिए विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त के मामले TV और Social media में देखने को मिलते हैं।
पैसों के इस खुले और भ्रष्ट खेल को जनता आसानी से अनदेखा कर देती है।
ये वही विधायक और सांसद हैं जो बिना किसी राजनीतिक विचारधारा के केवल अपने राजनीतिक वर्चस्व और धनबल के दम पर चुनाव जीतते हैं। यही जनप्रतिनिधि राजनीतिक दलों का संख्याबल बढ़ाते हैं और इन्हीं के बूते पार्टियां अपनी सरकार बनाती हैं।

राजनीतिक दलों में अस्थिरता

अक्सर यह देखा जाता है कि उम्मीदवार को पार्टी द्वारा टिकट नहीं मिलने पर वह अपनी विपरीत विचारधारा की राजनीतिक पार्टी भी join कर लेता है।
चुनावों के बाद भी सांसदों और विधायकों के दलबदल की खबरें आती रहती हैं।
इस प्रकार छोटे शहरों और कस्बों से स्थानीय वर्चस्व, पहचान और धनबल के दम पर चुनकर जीतकर आने वाले ये सांसद और विधायक विचारधारा की कमी की वजह से पार्टियां बदलते रहते हैं।
इस तरह की घटनाओं के कारण सभी राजनीतिक संगठनों में अस्थिरता बनी रहती है और अपने सांसदों एवं विधायकों को खोने का डर हमेशा बना रहता है।


भारत की राजनीति पर हमारा ये लेख भी पढ़ें और अपनी राय दें 👇 

क्या भारत में वास्तविक लोकतंत्र है?



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