क्या धर्म के नाम पर राजनीति लोकतंत्र के लिए खतरा है? | Is politics in the name of religion a threat to democracy?

दुनिया में राजनीति और धर्म के आपसी संबंध की बात की जाए तो प्राचीन काल से ही राजनीति पर धर्म का व्यापक प्रभाव रहा है।

मध्यकालीन युग में भी दुनिया के शासकों ने धार्मिक संस्थानों की छाया में शासन किया है। भारत में भी जिस समय जो धर्म अधिक प्रभाव में रहा, उसी को मानने वाले शासक सत्ता में आए और उसी प्रकार उनकी नीतियां रहीं।

दुनिया में जब भी लोकतंत्र की बात की जाती है, तो एक प्रश्न हमेशा सामने आता है कि क्या किसी धर्म विशेष के नाम पर राजनीति करना और सत्ता हासिल करना लोकतंत्र को कमजोर करता है।

दुनिया में धार्मिक सत्ता

प्राचीन मिस्र, मेसोपोटामिया और रोम के शासक स्वयं को ईश्वर का रूप मानते थे। जापान में भी सम्राट स्वयं को देवता मानते थे।

भारत की बात करें तो राजा स्वयं को धर्म का रक्षक मानते थे।

मध्यकाल में यूरोप में चर्च के पास भी राजनीतिक शक्ति थी, जबकि मध्यपूर्व में खिलाफत व्यवस्था के माध्यम से सत्ता चलाई जाती थी।

इब्राहिमी धर्मों (इस्लाम, ईसाई, यहूदी) ने भी राजनीति को अत्यधिक प्रभावित किया है।

भारत का उदाहरण

प्राचीन भारत में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर ही शासन संचालित किया और अधिक प्रयास बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए ही किए।

मुगल शासक भी अपनी नीतियों को इस्लाम के अनुसार ढालने का प्रयास करते थे और भारतीय हिन्दुओं तथा मुगल शासन के बीच टकराव की स्थिति बनी रहती थी।

अंग्रेजों ने भारत में धर्म के नाम पर जनता को बांटने की कोशिश की और 'बांटो और राज करो' की नीति अपनाई।

जनता एवं धार्मिक सत्ता का टकराव

यूरोप में कैथोलिक चर्च की अति के कारण 16 वीं शताब्दी में Martin Luther के नेतृत्व में प्रोटेस्टेंट आंदोलन की नींव पड़ी और जनता ने कैथोलिक चर्च की सत्ता को अस्वीकार कर दिया।

भारत में भी मुगल शासन काल में इस्लामिक सत्ता द्वारा हिन्दुओं पर जजिया कर लगाया गया, कुछ मंदिरों को ध्वस्त किया गया और सिख गुरुओं पर अत्याचार किए गए।

अंग्रेजों की बांटने की नीतियों के कारण भारतीय हिन्दुओं और मुसलमानों में टकराव बढ़ा और धर्म के आधार पर पाकिस्तान का गठन हुआ।

इसलिए दुनिया और विशेषकर भारत के संदर्भ में कहा जा सकता है कि धार्मिक सत्ता के परिणाम प्रतिकूल रहे हैं।

लोकतंत्र एवं धार्मिक मान्यता

लोकतंत्र की मूल मे ही यह बात है कि प्रकृति ने हर इंसान को बराबर बनाया है और उसे स्वतंत्र रूप से सोचने का अधिकार दिया है।

किसी भी धर्म विशेष को मानने वाला समूह यदि किसी दूसरे समूह पर अपने विचार थोपने की कोशिश करता है, तो निश्चित ही टकराव उत्पन्न होता है।

ईरान में भी एक बड़ा वर्ग वहां की शिया मुस्लिम सत्ता से असंतुष्ट रहता है।

भारत की बात करें तो कई राजनीतिक दलों, जिनमें भाजपा भी शामिल है, पर यह आरोप लगाया जाता रहा है कि वे धार्मिक मुद्दों पर जनता को प्रभावित करने और वोट प्राप्त करने की कोशिश करते हैं।

निष्कर्ष

यदि किसी धर्म विशेष को मानने वाला समूह सत्ता में आता है, तो निश्चित रूप से भिन्न विचार रखने वाले समूहों के साथ उसका टकराव बना रह सकता है, जिससे देश और दुनिया में लोकतंत्र के लिए खतरा उत्पन्न हो सकता है।

अन्ततः भारत की बात करें तो धर्म और राजनीति का संबंध केवल एक सामाजिक मुद्दा नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है। ऐसे में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या भारत में लोकतंत्र की अवधारणा सफल है?


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