फतेहपुर के दानवीर सेठ सोहनलाल दूगड़: जिन्हें दान किए बिना चैन नहीं मिलता था। | The Philanthropist Seth Sohanlal Dugar of Fatehpur: A Man Who Found No Peace Without Giving

Sohan Lal Dugar Fatehpur Shekhawati
Photo: Sohanlal Lal Dugar

ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो बिना किसी शोर-शराबे के समाज के लिए बहुत कुछ कर जाते हैं।
बात करते हैं ऐसी ही एक महान शख्सियत के बारे में, जिन्होंने जनसेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया।
ये कोई नेता नहीं थे और न ही इनकी जनसेवा नेताओं जैसी थी।
हम बात कर रहे हैं राजस्थान के सीकर जिले के फतेहपुर कस्बे के नामी सेठ सोहनलाल दूगड़ की।
सेठ सोहनलाल दुगड़ का जन्म 20 जून 1895 को उस समय के सीकर ठिकाने के एक छोटे से कस्बे फतेहपुर में हुआ था।

बचपन (Childhood)

सोहनलाल का बचपन बड़ा अभावग्रस्त रहा। पैसों की तंगी के कारण कोई औपचारिक शिक्षा नहीं हो पाई और केवल पारंपरिक गुरुओं से ही थोड़ा-बहुत सीखा।
गुरु शिक्षा में उनका अधिक मन नहीं लगता था और अधिक समय मोहल्ले के बालकों के साथ गुच्छी और चरभर (पारंपरिक खेल) खेलने में निकलता था।
चरभर के खेल में पैसे भी लगाए और सट्टे से पैसे कमाने का लोभ जग गया। परिवार अभावग्रस्त था, इसलिए पैसों का लोभ स्वाभाविक था।
एक-दो बार चरभर में पिताजी के पैसे हार गए, तो मार भी पड़ी।
एक धनी परिवार के संपर्क में आकर वे कलकत्ता गए और कुछ हासिल किए बिना वापस नहीं लौटने का प्रण लिया।

कलकत्ता में सट्टे का व्यापार (Gambling Trade in Calcutta)

बचपन में ही सट्टे का हल्का-फुल्का अनुभव रखने वाले सोहनलाल ने अपने भरोसेमंद लोगों के साथ मिलकर कलकत्ता में चावल, जूट, रुई और तेल के बड़े-बड़े सट्टे किए और खूब धन कमाने में सफल हुए।
उन्होंने अपने परिवार को भी ऋणमुक्त कर दिया।
सन् 1938 की बात है। इन्होंने जूट का एक बड़ा सट्टा कर रखा था। इसके लिए फसल की जानकारी एकत्र कर काफी समय पहले ही अनुमानित आंकड़े घोषित कर दिए।
कुछ समय बाद जब सरकारी आंकड़े घोषित हुए, तो लोगों के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। लगभग सभी आंकड़े सरकारी आंकड़ों से मेल खा रहे थे।
इस तरह ये जूट कारोबार के महारथी हो गए और इन्हें “जूट किंग” कहा जाने लगा।

दानवीरता (Philanthropy)

सेठ सोहनलाल दूगड़ की दानवीरता की जितनी मिसाल दी जाए, उतनी कम है।
वे अक्सर कहा करते थे --
“मैं तो एक सटोरिया हूँ, मेरी सारी कमाई पाप की कमाई है। इसलिए इसे जरूरतमंदों के उपयोग में नहीं दिया, तो भगवान मुझे कभी माफ नहीं करेंगे।”
सेठजी का मानना था कि उनके पास जो भी धन है, वह उनका नही है, बल्कि समाज ने उन्हें दिया है और उसे वापस समाज के पास ही जाना चाहिए।
दान के बदले अपने नाम की छाप छोड़ना बिल्कुल पसंद नहीं था।
एक बार एक विद्यालय के स्टाफ ने विद्यालय के दानदाताओं के नाम एक शिलापट्ट पर लिखवाए, जिसमें सेठजी का नाम प्रथम था। शिलापट्ट देखकर सेठजी बहुत नाराज हो गए। उन्होंने कहा --
“तुम लोग ये पाप मेरे सिर क्यों मढ़ना चाहते हो? मैं कोई दानदाता नहीं हूँ, मैं तो बस बच्चों का भविष्य का रास्ता आसान कर रहा हूँ।
जब बच्चे मेरा नाम शिलापट्ट पर देखेंगे, तो सोचेंगे कि जब एक अनपढ़ सटोरिया करोड़पति बन सकता है, तो वे क्यों पढ़ें?”
सेठजी महात्मा गांधी के विचारों से अत्यधिक प्रभावित थे, इसलिए उनका हरिजन प्रेम भी स्वाभाविक था।
उन्होंने हरिजनों के लिए पक्की बस्ती बनवाई, ताकि वे अपना जीवन आसानी से जी सकें।
वे कहते थे --
“हरिजन मानवजाति की जितनी सेवा करते हैं, उसके बदले क्या उन्हें सुलभ जीवन भी नहीं दिया जा सकता?”

इस तरह सेठ सोहनलाल दूगड़ की दानवीरता के बहुत से प्रसंग हैं।

सादगी 

धनसंपन्न होने के बावजूद सेठजी सादगी पसंद व्यक्ति थे उन्हें फिजूल खर्ची और दिखावा बिल्कुल भी पसंद नही था। वे कहते थे कि उनके पास जो धन है, वह लोगों की मेहनत की कमाई है और इसे ऐशो आराम में खर्च नही किया जाना चाहिए। वे अधिकतर रेलमार्ग से ही यात्रा किया करते थे।

शिक्षा के प्रति सम्मान (Respect for Education)

बचपन अभावों में गुजरने के कारण सेठजी स्वयं शिक्षा से वंचित रहे। शायद यही कारण था कि उनका शिक्षा के प्रति सम्मान बढ़ गया।
वे सोचते थे कि जिस शिक्षा से वे खुद वंचित रहे, उससे केवल आर्थिक तंगी के कारण कोई और वंचित रहे, यह उचित नहीं है।
बच्चों की शिक्षा के लिए सेठजी ने कई विद्यालयों में आर्थिक योगदान दिया, जिनमें सरदारशहर का गांधी विद्या मंदिर और बाल गृह, रतनगढ़ का गांधी बाल निकेतन और वनस्थली विद्यापीठ शामिल हैं।
महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सेठजी ने अपने पैतृक निवास फतेहपुर में विद्यालय का निर्माण करवाया।

ओशो से विशेष संबंध (Association with Osho)

ओशो (आचार्य रजनीश) एक बार जयपुर प्रवास पर थे। जब वे व्याख्यान दे रहे थे, तब संयोगवश सेठजी भी उन्हें सुनने के लिए पहुंचे।
सेठजी ओशो के विचारों से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें चढ़ावे के रूप में पैसों से भरा थैला स्वीकार करने का आग्रह किया।
पैसों से भरा थैला देखकर ओशो ने कहा --
“इसकी अभी कोई आवश्यकता नहीं है, जब आवश्यकता होगी तो मैं ले लूंगा।”
इस पर सेठजी को दुख हुआ और उन्होंने कहा --
“आचार्य श्री, मैं एक सटोरिया हूँ। आज मेरे पास यह धन है, कल पता नहीं यह होगा या नहीं। आप इसे स्वीकार करेंगे तो मुझ पर बड़ी कृपा होगी।”
ओशो सेठजी जैसी शख्सियत को देखकर चकित रह गए और उनके आग्रह पर वह धनराशि स्वीकार कर ली।
इस प्रसंग के बाद सेठजी के ओशो के साथ घनिष्ठ संबंध बन गए।
ओशो जब भी कलकत्ता प्रवास पर जाते, तो वे सेठजी के आवास पर ही ठहरते थे।
ओशो ने अपने कई व्याख्यानों में सेठ सोहनलाल दूगड़ और उनके अद्भुत व्यक्तित्व का उल्लेख किया है।

क्या उनके पैतृक स्थान फतेहपुर ने उन्हें भुला दिया? (Has his native place, Fatehpur, forgotten him?)

यह फतेहपुर जैसे छोटे कस्बे का सौभाग्य है कि सोहनलाल दूगड़ जैसी विलक्षण विभूति ने यहां जन्म लिया।
सेठजी ने अपनी दानवीरता से पूरे देश में फतेहपुर का नाम रोशन किया।

13 अक्टूबर 1968 को अल्प बीमारी के कारण सेठजी ने इस संसार को अलविदा कह दिया।

सेठ सोहनलाल दूगड़ की अद्वितीय विरासत फतेहपुर में आज भी मौजूद है, जो अतीत के उन पलों को अपने भीतर समेटे हुए है।
पर यह कहा जा सकता है कि आज की युवा पीढ़ी ने इस दिव्यात्मा को लगभग भुला दिया है।

तो ऐसे थे फतेहपुर-शेखावाटी के दानवीर सेठ सोहनलाल दुगड़।


[Source: दिव्यात्मा सोहनलाल दूगड़ - नलिन सराफ]


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