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डॉ. अंबेडकर ने संविधान की गारंटी क्यों नहीं दी?

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“आखिर ऐसा क्या था कि संविधान (Constitution) बनाने वाले डॉ. भीमराव आंबेडकर उसकी सफलता की गारंटी नहीं दे सके?” संविधान सभा ( Constituent Assembly ) की ड्राफ्टिंग कमिटी के अध्यक्ष डॉ. अंबेडकर ने कभी यह दावा नहीं किया कि भारत का संविधान हमेशा सफल रहेगा। वे केवल एक विधि विशेषज्ञ नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज और लोकतंत्र की गहराई को समझने वाले विचारक भी थे। उन्होंने दुनिया के बेहतरीन संविधानों की महत्वपूर्ण बातों को शामिल कर भारत का संविधान तैयार किया,  फिर भी उन्होंने इसकी सफलता की गारंटी नहीं दी। उन्होंने संविधान सभा में साफ शब्दों में कहा था— “संविधान की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि उसे चलाने वाले लोग कैसे हैं।” फोटो: डॉ. भीमराव अंबेडकर अपने ऑफिस में फोटो: बाबा साहब अम्बेडकर टेलिफोन पर बात करते हुए बाबा साहब ने भारत के संविधान ( Indian Constitution ) के बारे में ऐसा क्यों कहा था? तो आखिर वजह क्या थी? असल में, डॉ. भीमराव अंबेडकर को संविधान से ज़्यादा चिंता उसे चलाने वाले लोगों की थी। उनका मानना था कि भारतीय संविधान केवल एक ढांचा ( Framework ) है— इसे अच्छा या बुरा बनाने वाले लोग ही होते है...

फतेहपुर के दानवीर सेठ सोहनलाल दूगड़: जिन्हें दान किए बिना चैन नहीं मिलता था। | The Philanthropist Seth Sohanlal Dugar of Fatehpur: A Man Who Found No Peace Without Giving

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Photo: Sohanlal Lal Dugar ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो बिना किसी शोर-शराबे के समाज के लिए बहुत कुछ कर जाते हैं। बात करते हैं ऐसी ही  एक महान शख्सियत के बारे में, जिन्होंने जनसेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया। ये कोई नेता नहीं थे और न ही इनकी जनसेवा नेताओं जैसी थी। हम बात कर रहे हैं राजस्थान के सीकर जिले के फतेहपुर कस्बे के नामी सेठ सोहनलाल दूगड़ की। सेठ सोहनलाल दुगड़ का जन्म 20 जून 1895 को उस समय के सीकर ठिकाने के एक छोटे से कस्बे फतेहपुर में हुआ था। बचपन ( Childhood ) सोहनलाल का बचपन बड़ा अभावग्रस्त रहा। पैसों की तंगी के कारण कोई औपचारिक शिक्षा नहीं हो पाई और केवल पारंपरिक गुरुओं से ही थोड़ा-बहुत सीखा। गुरु शिक्षा में उनका अधिक मन नहीं लगता था और अधिक समय मोहल्ले के बालकों के साथ गुच्छी और चरभर (पारंपरिक खेल) खेलने में निकलता था। चरभर के खेल में पैसे भी लगाए और सट्टे से पैसे कमाने का लोभ जग गया। परिवार अभावग्रस्त था, इसलिए पैसों का लोभ स्वाभाविक था। एक-दो बार चरभर में पिताजी के पैसे हार गए, तो मार भी पड़ी। एक धनी परिवार के संपर्क में आकर वे कलकत्ता गए और कुछ हासिल किए बिना वाप...