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छोटे शहरों की राजनीति: क्या विचारधारा से ज्यादा धन बल, स्थानीय प्रभाव और पहचान मायने रखते हैं?

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भारत में राजनीतिक पार्टियां अपने सांसद, विधायकों और स्थानीय स्तर पर पार्षदों को अपनी विचारधारा के बलबूते खुद से जोड़ क्यों नहीं पातीं? क्यों पार्टी का टिकट नहीं मिलने पर चुनावी उम्मीदवार दूसरी पार्टी से जुड़ जाते हैं? क्या राजनीतिक पार्टियां केवल विधायकों और सांसदों की संख्या गिनती हैं? अगर ऐसा नहीं है, तो क्यों विधायक एवं सांसद के स्तर पर पार्टियों की विचारधाराएं फीकी पड़ जाती हैं? क्या स्थानीय राजनीति में विचारधारा का महत्व कम हो रहा है। संसद और विधानसभा चुनावों में छोटे शहरों और कस्बों का ही योगदान होता है। यहां से चुने गए सांसद और विधायक ही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की सरकार बनाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि उन छोटे शहरों और कस्बों की राजनीति किस तरह काम करती है, जहां से बिना किसी विचारधारा के दम पर सांसद और विधायक चुनकर आते हैं और इनकी संख्या गिनकर पार्टियां अपनी विचारधारा की सरकार बना लेती हैं। विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं कौनसी हैं? जब से दुनिया में democracy की बात हो रही है, तभी से इसे लागू करने के विचार भी जन्म लेते रहे हैं। ये विचार...

क्या RSS का हिंदुत्व और हिन्दू धर्म एक ही हैं, या दोनों अलग है? | Are RSS Hindutva and Hinduism the same, or are they different?

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हिंदुत्व बनाम हिंदू धर्म   आइए एक छोटी सी कहानी से समझने कि कोशिश करते हैं कि आखिर हिन्दू धर्म और हिंदुत्व में क्या फर्क है। बबलू आज स्कूल से जल्दी आ गया था। मन को थोड़ा हल्का करने के लिए वह अपने मोहल्ले की चाय की थड़ी पर जाकर बैठ गया। लेकिन आज माहौल कुछ अलग था… थड़ी पर काफी गर्मा गर्मी थी। गरम सिंह और नरम सिंह के बीच तगड़ी बहस चल रही थी। गरम सिंह RSS के हिंदुत्व को लेकर अपनी बात रख रहा था, जबकि नरम सिंह हिन्दू धर्म की बात कर रहा था। दोनों की बातें सुनकर बबलू कन्फ्यूज हो गया। 🤔 उसके मन में सवाल उठा -- “RSS का हिंदुत्व और हिन्दू धर्म… क्या ये दोनों एक ही हैं?” बबलू अब दोनों की बात ध्यान से सुनने लगा। नरम सिंह कह रहा था -- मैं सनातनी हिन्दू हूं… हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन जीने की कोशिश करता हूं। हिन्दू धर्म एक जीवन शैली है, और हिन्दू होना एक व्यक्तिगत मामला है। धर्म सामूहिक नहीं हो सकता, यह तो व्यक्तिगत मामला है। समूह का तो संप्रदाय होता है। मैं गीता, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र जैसे ग्रंथों को पढ़कर जीवन के गूढ़ प्रश्नों के उत्तर खोजने की कोशिश करता हूं। गरम सिंह अपनी बात जोर से रखता है ...

बबलू चला वोट डालने: क्या वह सच में लोकतंत्र को समझता है? | Bablu Goes to Vote: Does He Really Understand Democracy?

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भाईसाहब! आज लोकतंत्र का पर्व है… 🇮🇳 और बबलू पहली बार वोट डालने जा रहा है। उसे लग रहा है कि आज वह देश बदलने निकला है। अब बबलू अपने मोहल्ले के मतदान केंद्र की ओर बढ़ रहा है। उसके चेहरे पर उत्साह है… और मन में एक अजीब सा गर्व। रास्ते में उसे उसके क्षेत्र के एक पत्रकार महोदय मिल जाते हैं। पत्रकार मुस्कुराकर पूछते हैं -- “तुम्हारे इलाके की सबसे बड़ी समस्याएं क्या हैं?” बबलू बिना सोचे बोलना शुरू करता है -- “पानी की किल्लत है… नालियां रुकी हुई हैं… जगह-जगह जलभराव है… सड़कें भी टूटी हुई हैं…” पत्रकार फिर पूछते हैं -- “तो तुम किस पार्टी को वोट दोगे?” बबलू तुरंत जवाब देता है -- “बवंडर पार्टी को।” पत्रकार फिर पूछते हैं -- “क्यों? बवंडर पार्टी ही क्यों?” बबलू सहज होकर कहता है -- “हम तो हमेशा से उसी को वोट देते आए हैं… पापा भी उसी को देते हैं, भैया, बहन, मम्मी, चाचा-चाची… मेरे दादाजी और दादी भी इसी पार्टी को वोट देते आए हैं… और हमारे पड़ोसी भी सालों से इसी को वोट डालते आ रहे हैं। हमारा पूरा माहौल ही ऐसा है।” पत्रकार कुछ देर चुप रहते हैं, फिर गंभीर होकर पूछते हैं -- “क्या तुमने स्कूल में लोकतंत्र ...

क्या धर्म के नाम पर राजनीति लोकतंत्र के लिए खतरा है? | Is politics in the name of religion a threat to democracy?

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दुनिया में राजनीति और धर्म के आपसी संबंध की बात की जाए तो प्राचीन काल से ही राजनीति पर धर्म का व्यापक प्रभाव रहा है। मध्यकालीन युग में भी दुनिया के शासकों ने धार्मिक संस्थानों की छाया में शासन किया है। भारत में भी जिस समय जो धर्म अधिक प्रभाव में रहा, उसी को मानने वाले शासक सत्ता में आए और उसी प्रकार उनकी नीतियां रहीं। दुनिया में जब भी लोकतंत्र की बात की जाती है, तो एक प्रश्न हमेशा सामने आता है कि क्या किसी धर्म विशेष के नाम पर राजनीति करना और सत्ता हासिल करना लोकतंत्र को कमजोर करता है। दुनिया में धार्मिक सत्ता प्राचीन मिस्र, मेसोपोटामिया और रोम के शासक स्वयं को ईश्वर का रूप मानते थे। जापान में भी सम्राट स्वयं को देवता मानते थे। भारत की बात करें तो राजा स्वयं को धर्म का रक्षक मानते थे। मध्यकाल में यूरोप में चर्च के पास भी राजनीतिक शक्ति थी, जबकि मध्यपूर्व में खिलाफत व्यवस्था के माध्यम से सत्ता चलाई जाती थी। इब्राहिमी धर्मों (इस्लाम, ईसाई, यहूदी) ने भी राजनीति को अत्यधिक प्रभावित किया है। भारत का उदाहरण प्राचीन भारत में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म से प्रभावित होकर ही शासन संचालित किया और अ...

भारत में गौ रक्षा की बात क्यों होती है? सच भावना या राजनीति? | Why is Cow Protection Discussed in India? Truth, Sentiment, or Politics?

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आजकल भारत में गौ रक्षा का मुद्दा काफी गर्माया हुआ है। गौ रक्षा के लिए भारत में अलग-अलग संगठन भी काम कर रहे हैं। भारत के गाँव-गाँव में गौ रक्षा की बात हमेशा से होती रही है। गौ रक्षा के मुद्दे को लेकर धर्मगुरुओं और सरकारों के बीच टकराव भी समय-समय पर सामने आते रहते हैं। ज्योर्तिमठ के शंकराचार्य भी उत्तर प्रदेश सरकार पर गौ हत्या रोकने के लिए दबाव बना रहे हैं। आखिर गायों की रक्षा इतनी आवश्यक क्यों है कि समय-समय पर इसके लिए आवाज उठती रहती है? गौ रक्षा का ऐतिहासिक पहलू प्राचीन भारत में गाय अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख अंग थी। कृषि से संबंधित कार्य नंदी अथवा बैल के बिना लगभग असंभव थे। गाय के दूध और घी का उपयोग घर-घर में परिवार के भरण-पोषण के लिए किया जाता था, जबकि गाय के गोबर का उपयोग ईंधन के रूप में होता था। इस प्रकार गाय प्राचीन भारत में जीवन का एक अभिन्न हिस्सा थी, और जीवनदायिनी होने के कारण इसे माता का दर्जा दिया गया। किसी परिवार के पास जितनी अधिक गायें होती थीं, उसे उतना ही अधिक समृद्ध माना जाता था। राजा-महाराजा भी उपहार के रूप में गौदान किया करते थे। आज भी गाय का दूध और गोबर भारत सहित दुनिय...

क्या दुनिया को आज बुद्ध की शिक्षाओं की जरूरत है? | Relevance of Buddha Teachings Today

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आज दुनिया जटिलता, तनाव और असमानताओं से घिरी हुई है। मध्य-पूर्व में चल रहा युद्ध यह दर्शाता है कि दुनिया में तकनीकी विकास तो बहुत हुआ है, परंतु मनुष्य के भीतर अशांति और असंतोष बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में यह प्रश्न उठता है—क्या बुद्ध की नीतिगत शिक्षाएँ दुनिया में शांति ला सकती हैं? बुद्ध के समय का समाज सिद्धार्थ का जन्म ऐसे समय में हुआ जब भारत छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में बंटा हुआ था। लोभ, लालच और असंतुष्टि के कारण ये राज्य आपस में युद्धरत रहते थे। धार्मिक दृष्टि से उस समय का समाज कर्मकांडों और पाखंडों में उलझा हुआ था। इस प्रकार की सामाजिक जटिलताओं के कारण आम मनुष्य स्वयं को तनावग्रस्त महसूस करता था और अपने जीवन के मार्ग से भटकता जा रहा था। ऐसे सामाजिक रूप से त्रस्त आमजन को शांति का मार्ग दिखाने के लिए सिद्धार्थ ने बुद्ध बनकर अपना नीतिगत दर्शन प्रस्तुत किया। बुद्ध की शिक्षाएँ बुद्ध ने मनुष्य को शांति का मार्ग दिखाने के लिए चार आर्य सत्य (The Four Noble Truths) बताए। उन्होंने कहा कि— जीवन में दुःख है। दुःख के कारण हैं। दुःख के कारणों का निवारण संभव है। इस निवारण के लिए अष्टांगिक मार्ग ...

क्या "मजबूरी का नाम महात्मा गांधी" एक सही कहावत है? | Is the saying "Majboori ka naam Mahatma Gandhi" really justified?

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Photo: Mahatma Gandhi महात्मा गांधी: संकोच से संकल्प तक मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को एक पारंपरिक गुजराती परिवार में हुआ था। अपने प्रारंभिक जीवन में गांधी अत्यंत संकोची और शर्मीले स्वभाव के थे। अपनी पुस्तक “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” में उन्होंने स्वीकार किया है कि सार्वजनिक सभाओं और भाषणों में अपनी झिझक को दूर करने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। लेकिन अपने दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने इस कमजोरी पर विजय प्राप्त की और आगे चलकर दक्षिण अफ्रीका तथा भारत में सत्याग्रहों और आंदोलनों के माध्यम से जनसमूह को संगठित करने में सफल हुए। प्रारंभिक जीवन और व्यक्तित्व इस पुस्तक से यह भी स्पष्ट होता है कि गांधी में अपनी इच्छाओं—विशेषकर भोजन और इंद्रिय-नियंत्रण—पर काबू रखने की असाधारण क्षमता थी। हिंदू दर्शन के अनुयायी होने के कारण वे कट्टर शाकाहारी थे और उन्होंने गंभीर बीमारी के समय भी अपने इस सिद्धांत से समझौता नहीं किया। जब उनकी पत्नी कस्तूरबा को बीमारी के दौरान उनकी अनुपस्थिति में डॉक्टर द्वारा मांस का सूप दिया गया, तो यह बात उन्हें गहराई से आहत कर गई। दक्षिण अफ्री...