छोटे शहरों की राजनीति: क्या विचारधारा से ज्यादा धन बल, स्थानीय प्रभाव और पहचान मायने रखते हैं?
भारत में राजनीतिक पार्टियां अपने सांसद, विधायकों और स्थानीय स्तर पर पार्षदों को अपनी विचारधारा के बलबूते खुद से जोड़ क्यों नहीं पातीं? क्यों पार्टी का टिकट नहीं मिलने पर चुनावी उम्मीदवार दूसरी पार्टी से जुड़ जाते हैं? क्या राजनीतिक पार्टियां केवल विधायकों और सांसदों की संख्या गिनती हैं? अगर ऐसा नहीं है, तो क्यों विधायक एवं सांसद के स्तर पर पार्टियों की विचारधाराएं फीकी पड़ जाती हैं? क्या स्थानीय राजनीति में विचारधारा का महत्व कम हो रहा है। संसद और विधानसभा चुनावों में छोटे शहरों और कस्बों का ही योगदान होता है। यहां से चुने गए सांसद और विधायक ही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की सरकार बनाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि उन छोटे शहरों और कस्बों की राजनीति किस तरह काम करती है, जहां से बिना किसी विचारधारा के दम पर सांसद और विधायक चुनकर आते हैं और इनकी संख्या गिनकर पार्टियां अपनी विचारधारा की सरकार बना लेती हैं। विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं कौनसी हैं? जब से दुनिया में democracy की बात हो रही है, तभी से इसे लागू करने के विचार भी जन्म लेते रहे हैं। ये विचार...