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भीड़ या समूह में इंसान का व्यवहार क्यों बदल जाता है? (Group Psychology)

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इंसान एक सामाजिक प्राणी है। जन्म लेते ही उसका समाज से जुड़ाव शुरू हो जाता है और ये रिश्ते समय और परिस्थितियों के साथ बनते-बिगड़ते रहते हैं। वह पूरी जिंदगी इन्हीं सामाजिक संबंधों और रिश्ते-नातों को निभाने की कोशिश करता रहता है। हम अलग-अलग तरीकों से समाज से जुड़े होते हैं और हमारे फैसलों पर भी समाज का असर साफ दिखाई देता है। सामाजिक प्राणी होने के नाते हम समाज के तौर-तरीकों से पूरी तरह अलग नहीं रह सकते और धीरे-धीरे खुद को उसके अनुसार ढालने लगते हैं। कई बार हमें ऐसे समारोहों या मौकों का हिस्सा बनना ही पड़ता है, जहां बड़ी संख्या में लोग मौजूद होते हैं—चाहे वह राजनीतिक सभा हो, प्रदर्शन हो, गोष्ठी, कवि सम्मेलन या कोई शादी-ब्याह। क्या आपने कभी महसूस किया है कि जैसे ही हम किसी भीड़ या बड़े समूह का हिस्सा बनते हैं, हमारा आचरण और व्यवहार बदलने लगता है? हम अपनी समझ को पीछे छोड़कर उसी तरह व्यवहार करने लगते हैं, जैसा बाकी लोग कर रहे होते हैं।   ऐसा लगता है जैसे भीड़ की सामूहिक मानसिकता ( Group Psychology ) धीरे-धीरे हमारे दिमाग पर हावी हो जाती है। हम रोजमर्रा की जिंदगी में भी यह अनुभव करते रहते ...

Artemis-II मिशन: जिज्ञासा कैसे ले गई इंसान को चांद तक?

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चांद को लेकर इंसान की जिज्ञासा उसे ऐसे मुकाम पर ले आई है कि चांद पर जाना आज इंसान के लिए कोई दूर की कौड़ी नहीं रहा। इंसान जब भी आकाश की ओर देखता था, तो चांद का आकर्षण, उसका रहस्य और उससे जुड़ी कल्पनाएं उसे हमेशा अपनी ओर खींचती थीं। चंद्रमा ने इंसान को हमेशा से ही अचंभित किया है और उसे हमेशा से ही वहां जाने की लालसा रही है। पूरे सौर मंडल में चांद ही एक ऐसा पिंड है जो पृथ्वी के सबसे निकट है और यह पृथ्वी का एक प्राकृतिक उपग्रह ( Natural Satellite ) है। प्राचीन समय से लेकर आधुनिक युग तक चांद धरतीवासियों के जीवन का अहम हिस्सा है। Real Photo of Moon by NASA's Artemis-2 Mission  आखिर इंसान चांद को लेकर इतना उत्साहित क्यों रहता है? प्राचीन समय से जिज्ञासा प्राचीन समय में जब विज्ञान विकसित नहीं था, तो इंसान के लिए चांद के बारे में केवल कल्पनाएं करना ही संभव था। चांद प्राचीन समय से ही आस्था का विषय भी रहा है और सभी धर्मों में इसके बारे में अलग-अलग मान्यताएं भी प्रचलित हैं। दादी और नानी की चंदा मामा की कहानियां तो वर्तमान में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी प्राचीन समय से थीं। जब धीरे-धीरे वि...

राजस्थान में स्कूल फीस तय करने में अभिभावकों की भूमिका क्या है?

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Photo: Dramatic photo of a Private School देश में पिछले दस-पंद्रह वर्षों में प्राइवेट स्कूल (Private Schools) की संख्या तेजी से बढ़ी है और यह लगातार बढ़ रही है। हालांकि शिक्षण संस्थान खोलना एक सेवा कार्य है, परंतु आजकल यह किसी व्यापार से कम नहीं है। राजस्थान की बात करें तो यहां बड़े नगरों से लेकर छोटे कस्बों के गली-मोहल्लों तक पिछले कुछ वर्षों में निजी स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह उभरे हैं। निजी स्कूलों की संख्या बढ़ी है तो फीस (School Fees) और अन्य खर्चों को लेकर इनकी मनमानी भी बढ़ी है। स्कूलों की इस मनमानी को लेकर समय-समय पर जागरूक अभिभावकों की शिकायत पर यह बात सरकार के कानों तक पहुंची है। क्या आप जानते हैं कि राजस्थान सरकार (Rajasthan Government) ने निजी स्कूलों की बढ़ती फीस पर लगाम लगाने के लिए क्या-क्या कानूनी प्रावधान कर रखे हैं? फोटो: निजी स्कूलों के बच्चों का एक फोटो फीस निर्धारण में अभिभावकों की भागीदारी राजस्थान सरकार द्वारा सन् 2016 में ही राजस्थान विद्यालय (फीस का विनियमन) अधिनियम, 2016 (Rajasthan School Fees Act 2016) पारित किया जा चुका है, जिसके अनुसार बच्चों के अभिभावक...

सुकरात: अपने विचारों से समझौते की बजाय ज़हर क्यों चुना?

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Photo: A Statue of Socrates क्या आप एक ऐसे व्यक्ति के बारे में जानते हैं जिसने अपनी सोच, अपने विचारों से समझौता करने की बजाय ज़हर पीकर खुशी-खुशी मौत को स्वीकार करना सही समझा? हम बात कर रहे हैं पश्चिम के एक महान दार्शनिक सुकरात (Socrates) की, जिसे पश्चिमी दर्शन का पिता कहा जाता है। कौन थे सुकरात? सुकरात का जन्म 469 ईसा पूर्व में प्राचीन ग्रीस की राजधानी एथेंस में हुआ था। प्राचीन एथेंस एक बहुत ही सुंदर शहर था, परंतु वहां जन्मे सुकरात को सुंदरता नसीब न थीं। सर पर लंबे बाल, ऊबड़-खाबड़ दाढ़ी, चपटी नाक और गोल-मटोल पेट वाले सुकरात छोटे कद के और मजबूत शरीर के थे। वे हमेशा नंगे पांव रहते थे और पूरे शरीर पर केवल एक लबादा ओढ़े रहते थे। सुकरात दिखने में भले ही कुरूप थे, लेकिन उनके जीवन और विचारों में सुंदरता की कोई सीमा नहीं थी। वे बुद्धिमान और चिंतनशील स्वभाव के एक सीधे-सादे व्यक्ति थे। एथेंस में सुकरात के खिलाफ कई तरह के आरोप लगे और इनके चलते अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। फोटो: सुकरात की एक मूर्ति  सुकरात के विचार क्या थे? सुकरात एक जिज्ञासु स्वभाव के व्यक्ति थे और किसी भी बात को गहराई स...

गुजरात में सोहन चिड़िया का ‘VIP’ चूज़ा: सुरक्षा में 50 अधिकारी और कर्मचारी तैनात

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सोहन चिड़िया का दुर्लभ फोटो  राजस्थान की दुर्लभ सोहन चिड़िया ( Great Indian Bustard ) दोस्तों, बचपन में सोहन चिड़िया की कहानी तो आप सभी ने सुनी होगी। पर क्या आपने सोहन चिड़िया का केवल नाम ही सुना है या इसे कभी देखा भी है? इसे देखना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि यह बहुत दुर्लभ है और पूरे भारत में लगभग 150 के आसपास ही बची है। Gen-Z तो शायद सोहन चिड़िया से बिल्कुल भी परिचित नहीं होगा। Great Indian Bustard को राजस्थान में सोहन चिड़िया और गोडावण दोनों नामों से जाना जाता है। गुजरात में इसे घोराड़ भी कहा जाता है। यह लगभग एक मीटर लंबाई का एक भारी पक्षी होता है, जो प्रमुख रूप से राजस्थान में मिलता है। राजस्थान के अलावा यह गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी पाया जाता है। The Great Indian Bustard  गुजरात में लंबे समय बाद सोहन चिड़िया के चूज़े का जन्म सोहन चिड़िया को लुप्त होने से बचाने के लिए भारत सरकार द्वारा काफी प्रयास किए जा रहे हैं, जिसका ताजा उदाहरण हाल ही में गुजरात में देखने को मिला है। 26 मार्च 2026 को गुजरात के कच्छ के घास के मैदानों में दुर्लभ पक्षी सोहन चिड़िया ...

कभी दुनिया का अजूबा थी... आज बदहाली का शिकार है: फतेहपुर शेखावाटी की 'नवाब अलफ खां की बावड़ी'

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2026 में फतेहपुर शेखावाटी बावड़ी की एक फोटो  फतेहपुर शेखावाटी कस्बा राजस्थान के हेरिटेज शहरों  में शुमार है और यहां की विश्व प्रसिद्ध वास्तुकला की वजह से इसे ' Open Art Gallery' भी कहा जाता है। पर क्या आप जानते हैं कि फतेहपुर शेखावाटी में मध्यकाल की वास्तु और स्थापत्य कला का एक ऐसा नमूना मौजूद है, जो किसी अजूबे से कम नहीं है। जी हां! हम बात कर रहे हैं फतेहपुर शेखावाटी की 'नवाब अलफ खां की बावड़ी'  ( Nawab Alaf Khan ki Bawri) की, जिसे सन् 1614 ईस्वी में नवाब अलफ खां के बेटे दौलत खां ने बनवाया था। यह बावड़ी शेखावाटी में 'नवाबी बावड़ी' के नाम से प्रसिद्ध है। The Famous Fatehpur Shekhawati Stepwell यह बावड़ी अपने आप में इतनी अनूठी थी कि इतिहासकारों ने इसे दुनिया के 17 अजूबों में शामिल किया था। फतेहपुर के बावड़ी गेट क्षेत्र का नाम भी इसी बावड़ी के नाम पर पड़ा है। फतेहपुर बावड़ी एक अजूबा कैसे थी? बावड़ी का निर्माण नागौर के एक कारीगर शेख महमूद द्वारा किया गया था। अंदर से इसका पूरा ढांचा एक भूल-भुलैया जैसा बनाया गया था। ऐसा कहा जाता है कि इसके अंदर से एक सुरंग का रास्...

छोटे शहरों की राजनीति: क्या विचारधारा से ज्यादा धन बल, स्थानीय प्रभाव और पहचान मायने रखते हैं?

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भारत में राजनीतिक पार्टियां अपने सांसद, विधायकों और स्थानीय स्तर पर पार्षदों को अपनी विचारधारा के बलबूते खुद से जोड़ क्यों नहीं पातीं? क्या राजनीतिक पार्टियां केवल विधायकों और सांसदों की संख्या गिनती हैं? अगर ऐसा नहीं है, तो क्यों विधायक एवं सांसद के स्तर पर पार्टियों की विचारधाराएं फीकी पड़ जाती हैं? क्या स्थानीय राजनीति में विचारधारा का महत्व कम हो रहा है। संसद और विधानसभा चुनावों में छोटे शहरों और कस्बों का ही योगदान होता है। यहां से चुने गए सांसद और विधायक ही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की सरकार बनाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि उन छोटे शहरों और कस्बों की राजनीति किस तरह काम करती है, जहां से बिना किसी विचारधारा के दम पर सांसद और विधायक चुनकर आते हैं और इनकी संख्या गिनकर पार्टियां अपनी विचारधारा की सरकार बना लेती हैं। क्यों पार्टी का टिकट नहीं मिलने पर चुनावी उम्मीदवार दूसरी पार्टी से जुड़ जाते हैं? विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं कौनसी हैं? जब से दुनिया में democracy की बात हो रही है, तभी से इसे लागू करने के विचार भी जन्म लेते रहे हैं। ये विचार...