डॉ. अंबेडकर ने संविधान की गारंटी क्यों नहीं दी?
“आखिर ऐसा क्या था कि संविधान (Constitution) बनाने वाले डॉ. भीमराव आंबेडकर उसकी सफलता की गारंटी नहीं दे सके?”
संविधान सभा (Constituent Assembly) की ड्राफ्टिंग कमिटी के अध्यक्ष डॉ. अंबेडकर ने कभी यह दावा नहीं किया कि भारत का संविधान हमेशा सफल रहेगा।
वे केवल एक विधि विशेषज्ञ नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज और लोकतंत्र की गहराई को समझने वाले विचारक भी थे।
उन्होंने दुनिया के बेहतरीन संविधानों की महत्वपूर्ण बातों को शामिल कर भारत का संविधान तैयार किया, फिर भी उन्होंने इसकी सफलता की गारंटी नहीं दी।
उन्होंने संविधान सभा में साफ शब्दों में कहा था—
“संविधान की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि उसे चलाने वाले लोग कैसे हैं।”
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| फोटो: डॉ. भीमराव अंबेडकर अपने ऑफिस में |
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| फोटो: बाबा साहब अम्बेडकर टेलिफोन पर बात करते हुए |
बाबा साहब ने भारत के संविधान (Indian Constitution) के बारे में ऐसा क्यों कहा था?
तो आखिर वजह क्या थी?
असल में, डॉ. भीमराव अंबेडकर को संविधान से ज़्यादा चिंता उसे चलाने वाले लोगों की थी।
अगर सत्ता में बैठे लोग ईमानदार, जिम्मेदार और संवेदनशील होंगे, तो कोई भी संविधान सफल हो सकता है।
लेकिन अगर वही लोग स्वार्थी, भ्रष्ट या पक्षपाती हो जाएं, तो सबसे अच्छा संविधान भी असफल हो सकता है।
संविधान एक किताब नहीं, एक जिम्मेदारी है
अंबेडकर ने भारतीय संविधान को एक “जीवित दस्तावेज़” (Living Document) की तरह देखा।
सिर्फ संविधान बना देना काफी नहीं होता, उसे सही और निष्पक्ष तरीके से लागू करना भी उतना ही जरूरी होता है।
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| फोटो: डॉ. अंबेडकर भाषण देते हुए |
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| फोटो: डॉ. अंबेडकर और सी. राजगोपालाचारी |
डॉ. अंबेडकर की सबसे बड़ी चिंता क्या थी?
उनकी सबसे बड़ी चिंता यह थी कि—
भारत में राजनीतिक समानता तो आ जाएगी, लेकिन सामाजिक और आर्थिक असमानता बनी रहेगी।
अगर यह असमानता खत्म नहीं हुई, तो लोग इस व्यवस्था और लोकतंत्र पर भरोसा खो सकते हैं।
अंबेडकर की सोच उनके अनुभव से आई थी
यह बात सिर्फ एक विचार नहीं थी, बल्कि उनके अपने अनुभवों से निकली थी।
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| Photo: Dr. Ambedkar delivering a public Speech |
उन्हें संविधान बनाने की जिम्मेदारी किसी सिफारिश या चापलूसी से नहीं, बल्कि उनकी असाधारण प्रतिभा के कारण मिली थी।
उन्होंने अमेरिका और लंदन से उच्च शिक्षा प्राप्त की और भारतीय समाज की जटिलताओं को करीब से देखा।
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| फोटो: डॉ. अंबेडकर कोलंबिया विश्वविद्यालय में |
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| Photo: Dr. Ambedkar at Columbia University |
अंबेडकर का जन्म मध्य प्रदेश के महू में "महार" नामक जाति में हुआ था, जिसे अछूत समझा जाता था।
बचपन में उन्होंने सामाजिक भेदभाव को बहुत करीब से झेला। स्कूल में उन्हें अलग बैठाया जाता था और पानी तक छूने की अनुमति नहीं थी।
जवानी के दिनों में भी, उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद, उन्हें किराए का कमरा लेने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी।
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| Photo: Dr. Bheem Rao Ambedkar |
उन्होंने स्वयं सामाजिक भेदभाव झेला था, और यह भी देखा था कि कानून होने के बावजूद समाज में बराबरी नहीं होती।
बाबा साहब को सामाजिक भेदभाव के कारण जीवन भर संघर्ष करना पड़ा।
वे सामाजिक समानता के पक्षधर थे और इसी कारण वे महात्मा बुद्ध के विचारों से काफी प्रभावित थे।
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| Photo: Dr. Ambedkar taking oath of Buddhism |
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| Photo: Dr. B R Ambedkar with his wife |
क्या बाबा साहब की बात आज भी प्रासंगिक है?
कई बार यह देखने को मिलता है कि संविधान की भावना के अनुसार काम नहीं होता।
कभी-कभी सत्ता में बैठे लोग अपने अधिकारों का इस्तेमाल इस तरह करते हैं, जिससे निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
सत्ता चाहे किसी के भी हाथ में हो, उसके दुरुपयोग की संभावना हमेशा बनी रहती है।
इसलिए भारतीय संविधान की सफलता केवल उसके प्रावधानों पर नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करती है कि उसे चलाने वाले लोग कैसे हैं।











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