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डॉ. अंबेडकर ने संविधान की गारंटी क्यों नहीं दी?

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“आखिर ऐसा क्या था कि संविधान (Constitution) बनाने वाले डॉ. भीमराव आंबेडकर उसकी सफलता की गारंटी नहीं दे सके?” संविधान सभा ( Constituent Assembly ) की ड्राफ्टिंग कमिटी के अध्यक्ष डॉ. अंबेडकर ने कभी यह दावा नहीं किया कि भारत का संविधान हमेशा सफल रहेगा। वे केवल एक विधि विशेषज्ञ नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज और लोकतंत्र की गहराई को समझने वाले विचारक भी थे। उन्होंने दुनिया के बेहतरीन संविधानों की महत्वपूर्ण बातों को शामिल कर भारत का संविधान तैयार किया,  फिर भी उन्होंने इसकी सफलता की गारंटी नहीं दी। उन्होंने संविधान सभा में साफ शब्दों में कहा था— “संविधान की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि उसे चलाने वाले लोग कैसे हैं।” फोटो: डॉ. भीमराव अंबेडकर अपने ऑफिस में फोटो: बाबा साहब अम्बेडकर टेलिफोन पर बात करते हुए बाबा साहब ने भारत के संविधान ( Indian Constitution ) के बारे में ऐसा क्यों कहा था? तो आखिर वजह क्या थी? असल में, डॉ. भीमराव अंबेडकर को संविधान से ज़्यादा चिंता उसे चलाने वाले लोगों की थी। उनका मानना था कि भारतीय संविधान केवल एक ढांचा ( Framework ) है— इसे अच्छा या बुरा बनाने वाले लोग ही होते है...

भीड़ या समूह में इंसान का व्यवहार क्यों बदल जाता है? (Group Psychology)

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इंसान एक सामाजिक प्राणी है। जन्म लेते ही उसका समाज से जुड़ाव शुरू हो जाता है और ये रिश्ते समय और परिस्थितियों के साथ बनते-बिगड़ते रहते हैं। वह पूरी जिंदगी इन्हीं सामाजिक संबंधों और रिश्ते-नातों को निभाने की कोशिश करता रहता है। हम अलग-अलग तरीकों से समाज से जुड़े होते हैं और हमारे फैसलों पर भी समाज का असर साफ दिखाई देता है। सामाजिक प्राणी होने के नाते हम समाज के तौर-तरीकों से पूरी तरह अलग नहीं रह सकते और धीरे-धीरे खुद को उसके अनुसार ढालने लगते हैं। कई बार हमें ऐसे समारोहों या मौकों का हिस्सा बनना ही पड़ता है, जहां बड़ी संख्या में लोग मौजूद होते हैं—चाहे वह राजनीतिक सभा हो, प्रदर्शन हो, गोष्ठी, कवि सम्मेलन या कोई शादी-ब्याह। क्या आपने कभी महसूस किया है कि जैसे ही हम किसी भीड़ या बड़े समूह का हिस्सा बनते हैं, हमारा आचरण और व्यवहार बदलने लगता है? हम अपनी समझ को पीछे छोड़कर उसी तरह व्यवहार करने लगते हैं, जैसा बाकी लोग कर रहे होते हैं।   ऐसा लगता है जैसे भीड़ की सामूहिक मानसिकता ( Group Psychology ) धीरे-धीरे हमारे दिमाग पर हावी हो जाती है। हम रोजमर्रा की जिंदगी में भी यह अनुभव करते रहते ...

राजस्थान में स्कूल फीस तय करने में अभिभावकों की भूमिका क्या है?

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Photo: Dramatic photo of a Private School देश में पिछले दस-पंद्रह वर्षों में प्राइवेट स्कूल (Private Schools) की संख्या तेजी से बढ़ी है और यह लगातार बढ़ रही है। हालांकि शिक्षण संस्थान खोलना एक सेवा कार्य है, परंतु आजकल यह किसी व्यापार से कम नहीं है। राजस्थान की बात करें तो यहां बड़े नगरों से लेकर छोटे कस्बों के गली-मोहल्लों तक पिछले कुछ वर्षों में निजी स्कूल कुकुरमुत्तों की तरह उभरे हैं। निजी स्कूलों की संख्या बढ़ी है तो फीस (School Fees) और अन्य खर्चों को लेकर इनकी मनमानी भी बढ़ी है। स्कूलों की इस मनमानी को लेकर समय-समय पर जागरूक अभिभावकों की शिकायत पर यह बात सरकार के कानों तक पहुंची है। क्या आप जानते हैं कि राजस्थान सरकार (Rajasthan Government) ने निजी स्कूलों की बढ़ती फीस पर लगाम लगाने के लिए क्या-क्या कानूनी प्रावधान कर रखे हैं? फोटो: निजी स्कूलों के बच्चों का एक फोटो फीस निर्धारण में अभिभावकों की भागीदारी राजस्थान सरकार द्वारा सन् 2016 में ही राजस्थान विद्यालय (फीस का विनियमन) अधिनियम, 2016 (Rajasthan School Fees Act 2016) पारित किया जा चुका है, जिसके अनुसार बच्चों के अभिभावक...

गुजरात में सोहन चिड़िया का ‘VIP’ चूज़ा: सुरक्षा में 50 अधिकारी और कर्मचारी तैनात

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सोहन चिड़िया का दुर्लभ फोटो  राजस्थान की दुर्लभ सोहन चिड़िया ( Great Indian Bustard ) दोस्तों, बचपन में सोहन चिड़िया की कहानी तो आप सभी ने सुनी होगी। पर क्या आपने सोहन चिड़िया का केवल नाम ही सुना है या इसे कभी देखा भी है? इसे देखना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि यह बहुत दुर्लभ है और पूरे भारत में लगभग 150 के आसपास ही बची है। Gen-Z तो शायद सोहन चिड़िया से बिल्कुल भी परिचित नहीं होगा। Great Indian Bustard को राजस्थान में सोहन चिड़िया और गोडावण दोनों नामों से जाना जाता है। गुजरात में इसे घोराड़ भी कहा जाता है। यह लगभग एक मीटर लंबाई का एक भारी पक्षी होता है, जो प्रमुख रूप से राजस्थान में मिलता है। राजस्थान के अलावा यह गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी पाया जाता है। The Great Indian Bustard  गुजरात में लंबे समय बाद सोहन चिड़िया के चूज़े का जन्म सोहन चिड़िया को लुप्त होने से बचाने के लिए भारत सरकार द्वारा काफी प्रयास किए जा रहे हैं, जिसका ताजा उदाहरण हाल ही में गुजरात में देखने को मिला है। 26 मार्च 2026 को गुजरात के कच्छ के घास के मैदानों में दुर्लभ पक्षी सोहन चिड़िया ...

कभी दुनिया का अजूबा थी... आज बदहाली का शिकार है: फतेहपुर शेखावाटी की 'नवाब अलफ खां की बावड़ी'

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2026 में फतेहपुर शेखावाटी बावड़ी की एक फोटो  फतेहपुर शेखावाटी कस्बा राजस्थान के हेरिटेज शहरों  में शुमार है और यहां की विश्व प्रसिद्ध वास्तुकला की वजह से इसे ' Open Art Gallery' भी कहा जाता है। पर क्या आप जानते हैं कि फतेहपुर शेखावाटी में मध्यकाल की वास्तु और स्थापत्य कला का एक ऐसा नमूना मौजूद है, जो किसी अजूबे से कम नहीं है। जी हां! हम बात कर रहे हैं फतेहपुर शेखावाटी की 'नवाब अलफ खां की बावड़ी'  ( Nawab Alaf Khan ki Bawri) की, जिसे सन् 1614 ईस्वी में नवाब अलफ खां के बेटे दौलत खां ने बनवाया था। यह बावड़ी शेखावाटी में 'नवाबी बावड़ी' के नाम से प्रसिद्ध है। The Famous Fatehpur Shekhawati Stepwell यह बावड़ी अपने आप में इतनी अनूठी थी कि इतिहासकारों ने इसे दुनिया के 17 अजूबों में शामिल किया था। फतेहपुर के बावड़ी गेट क्षेत्र का नाम भी इसी बावड़ी के नाम पर पड़ा है। फतेहपुर बावड़ी एक अजूबा कैसे थी? बावड़ी का निर्माण नागौर के एक कारीगर शेख महमूद द्वारा किया गया था। अंदर से इसका पूरा ढांचा एक भूल-भुलैया जैसा बनाया गया था। ऐसा कहा जाता है कि इसके अंदर से एक सुरंग का रास्...

फतेहपुर के दानवीर सेठ सोहनलाल दूगड़: जिन्हें दान किए बिना चैन नहीं मिलता था। | The Philanthropist Seth Sohanlal Dugar of Fatehpur: A Man Who Found No Peace Without Giving

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Photo: Sohanlal Lal Dugar ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो बिना किसी शोर-शराबे के समाज के लिए बहुत कुछ कर जाते हैं। बात करते हैं ऐसी ही  एक महान शख्सियत के बारे में, जिन्होंने जनसेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया। ये कोई नेता नहीं थे और न ही इनकी जनसेवा नेताओं जैसी थी। हम बात कर रहे हैं राजस्थान के सीकर जिले के फतेहपुर कस्बे के नामी सेठ सोहनलाल दूगड़ की। सेठ सोहनलाल दुगड़ का जन्म 20 जून 1895 को उस समय के सीकर ठिकाने के एक छोटे से कस्बे फतेहपुर में हुआ था। बचपन ( Childhood ) सोहनलाल का बचपन बड़ा अभावग्रस्त रहा। पैसों की तंगी के कारण कोई औपचारिक शिक्षा नहीं हो पाई और केवल पारंपरिक गुरुओं से ही थोड़ा-बहुत सीखा। गुरु शिक्षा में उनका अधिक मन नहीं लगता था और अधिक समय मोहल्ले के बालकों के साथ गुच्छी और चरभर (पारंपरिक खेल) खेलने में निकलता था। चरभर के खेल में पैसे भी लगाए और सट्टे से पैसे कमाने का लोभ जग गया। परिवार अभावग्रस्त था, इसलिए पैसों का लोभ स्वाभाविक था। एक-दो बार चरभर में पिताजी के पैसे हार गए, तो मार भी पड़ी। एक धनी परिवार के संपर्क में आकर वे कलकत्ता गए और कुछ हासिल किए बिना वाप...

बबलू चला वोट डालने: क्या वह सच में लोकतंत्र को समझता है? | Bablu Goes to Vote: Does He Really Understand Democracy?

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भाईसाहब! आज लोकतंत्र का पर्व है… 🇮🇳 और बबलू पहली बार वोट डालने जा रहा है। उसे लग रहा है कि आज वह देश बदलने निकला है। अब बबलू अपने मोहल्ले के मतदान केंद्र की ओर बढ़ रहा है। उसके चेहरे पर उत्साह है… और मन में एक अजीब सा गर्व। रास्ते में उसे उसके क्षेत्र के एक पत्रकार महोदय मिल जाते हैं। पत्रकार मुस्कुराकर पूछते हैं -- “तुम्हारे इलाके की सबसे बड़ी समस्याएं क्या हैं?” बबलू बिना सोचे बोलना शुरू करता है -- “पानी की किल्लत है… नालियां रुकी हुई हैं… जगह-जगह जलभराव है… सड़कें भी टूटी हुई हैं…” पत्रकार फिर पूछते हैं -- “तो तुम किस पार्टी को वोट दोगे?” बबलू तुरंत जवाब देता है -- “बवंडर पार्टी को।” पत्रकार फिर पूछते हैं -- “क्यों? बवंडर पार्टी ही क्यों?” बबलू सहज होकर कहता है -- “हम तो हमेशा से उसी को वोट देते आए हैं… पापा भी उसी को देते हैं, भैया, बहन, मम्मी, चाचा-चाची… मेरे दादाजी और दादी भी इसी पार्टी को वोट देते आए हैं… और हमारे पड़ोसी भी सालों से इसी को वोट डालते आ रहे हैं। हमारा पूरा माहौल ही ऐसा है।” पत्रकार कुछ देर चुप रहते हैं, फिर गंभीर होकर पूछते हैं -- “क्या तुमने स्कूल में लोकतंत्र ...