भीड़ या समूह में इंसान का व्यवहार क्यों बदल जाता है? (Group Psychology)

Person standing away from Crowd


इंसान एक सामाजिक प्राणी है। जन्म लेते ही उसका समाज से जुड़ाव शुरू हो जाता है और ये रिश्ते समय और परिस्थितियों के साथ बनते-बिगड़ते रहते हैं।
वह पूरी जिंदगी इन्हीं सामाजिक संबंधों और रिश्ते-नातों को निभाने की कोशिश करता रहता है।

हम अलग-अलग तरीकों से समाज से जुड़े होते हैं और हमारे फैसलों पर भी समाज का असर साफ दिखाई देता है।

सामाजिक प्राणी होने के नाते हम समाज के तौर-तरीकों से पूरी तरह अलग नहीं रह सकते और धीरे-धीरे खुद को उसके अनुसार ढालने लगते हैं।

कई बार हमें ऐसे समारोहों या मौकों का हिस्सा बनना ही पड़ता है, जहां बड़ी संख्या में लोग मौजूद होते हैं—चाहे वह राजनीतिक सभा हो, प्रदर्शन हो, गोष्ठी, कवि सम्मेलन या कोई शादी-ब्याह।

क्या आपने कभी महसूस किया है कि जैसे ही हम किसी भीड़ या बड़े समूह का हिस्सा बनते हैं, हमारा आचरण और व्यवहार बदलने लगता है?
हम अपनी समझ को पीछे छोड़कर उसी तरह व्यवहार करने लगते हैं, जैसा बाकी लोग कर रहे होते हैं।

राजनीतिक भीड़ में व्यक्ति का बदलता व्यवहार
 
ऐसा लगता है जैसे भीड़ की सामूहिक मानसिकता (Group Psychology) धीरे-धीरे हमारे दिमाग पर हावी हो जाती है।

हम रोजमर्रा की जिंदगी में भी यह अनुभव करते रहते हैं।
जैसे ही हम किसी मित्र समूह, जनसमूह या समारोह का हिस्सा बनते हैं, हमारा व्यवहार अपने आप उस माहौल के अनुसार बदल जाता है।

यह बदलाव अक्सर हमारी असली प्रवृत्ति से अलग होता है, लेकिन उस समय हमें यह बिल्कुल स्वाभाविक लगता है।
और जैसे ही हम उस समूह से बाहर आते हैं, हम फिर से अपने पुराने रूप में लौट आते हैं।

भीड़ से अलग होता व्यक्ति

उदाहरण के तौर पर देखें, तो बड़े से बड़ा अपराधी भी जब सभ्य लोगों के बीच जाता है, तो उसका व्यवहार बदल जाता है और वह अधिक शालीन दिखाई देने लगता है। कई बार इसके बिल्कुल उलट भी हमें अपने आसपास देखने को मिल जाता है।

बड़े आंदोलनों और प्रदर्शनों में भी ऐसा ही देखने को मिलता है।
वहां व्यक्ति का दिमाग माहौल से प्रभावित होकर अपने आप काम करने लगता है और कई बार वह ऐसा कुछ कर या बोल देता है, जो वह सामान्य परिस्थितियों में कभी नहीं करता।

आखिर भीड़ या समूह में व्यक्ति का व्यवहार क्यों बदल जाता है? यह एक रोचक मनोवैज्ञानिक सवाल है।


भीड़ में दिमाग कैसे काम करता है?

जब व्यक्ति किसी समूह का हिस्सा बनता है, तो उसका दिमाग अलग तरीके से काम करने लगता है।

वह अपने फैसलों की बजाय आसपास के लोगों के व्यवहार को ज्यादा महत्व देने लगता है और भीड़ मनोविज्ञान (Crowd Psychology) के अधीन हो जाता है।

दिमाग यह मान लेता है कि समूह का व्यवहार ही सही है और उसी के अनुसार खुद को ढालने लगता है।

समूह के साथ चलता व्यक्ति

स्वीकार किए जाने की इच्छा

जब व्यक्ति किसी समूह का हिस्सा बनता है तो वह चाहता है कि उसे समूह में स्वीकार किया जाए। इसी कारण वह अपने व्यवहार को समूह के अनुसार ढालने की कोशिश करता है। इसके लिए वह ऐसा व्यवहार करने लगता है, जिससे लोग उसे स्वीकार करें और वह उस भीड़ का हिस्सा महसूस कर सके। कई बार यह चाहत इतनी बढ़ जाती है कि व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत सोच और समझ को पीछे छोड़ देता है।

भीड़ के साथ चलता व्यक्ति

सामाजिक दबाव

समूह के भीतर व्यक्ति पर एक अदृश्य दबाव होता है, जो उसे अलग सोचने या अलग व्यवहार करने से रोकता है।

व्यक्तिगत पहचान का कमजोर पड़ जाना

जब व्यक्ति किसी भीड़ का हिस्सा बनता है, तो उसकी व्यक्तिगत पहचान कमजोर होने लगती है। समूह में व्यक्ति का ध्यान अपने ऊपर से हटकर दूसरों पर चला जाता है।
वह यह देखने में ज्यादा व्यस्त हो जाता है कि बाकी लोग क्या कर रहे हैं, और इस कारण वह अपने व्यक्तिगत व्यवहार की बजाय सामूहिक व्यवहार (Group Behavior) अपनाने लगता है।

व्यक्ति का व्यवहार भीड़ के प्रभाव में बदलता हुआ
 

अनजाने में होने वाला व्यवहार (Automatic Behavior)

कई बार यह बदलाव इतना तेज होता है कि व्यक्ति को खुद भी एहसास नहीं होता कि उसका व्यवहार बदल रहा है।
वह बिना सोचे-समझे वही करने या बोलने लगता है, जो बाकी लोग कर रहे होते हैं।

Automatic behavior of person in a Group

भावनाओं का तेजी से फैलना

भीड़ में भावनाएं बहुत तेजी से फैलती हैं। अगर भीड़ में गुस्सा है, तो हर व्यक्ति धीरे-धीरे उसी गुस्से का हिस्सा बन जाता है। अगर उत्साह है, तो वह भी तेजी से बढ़ता है। इस स्थिति में व्यक्ति तर्क से ज्यादा भावनाओं के आधार पर निर्णय लेने लगता है।

गुस्से में भीड़ का सामूहिक व्यवहार

अंत में कहा जा सकता है कि समूह का हिस्सा बनना स्वाभाविक है, लेकिन उस दौरान अपनी सोच को पूरी तरह खो देना सही नहीं है।
असली समझ यही है कि हम भीड़ में रहकर भी खुद से सोच सकें।
भीड़ हमें प्रभावित तो कर सकती है, लेकिन हमारी सोच नहीं बदल सकती।

व्यक्ति समूह से दूर जाता हुआ


अकेले बैठा व्यक्ति सोचते हुए

असली समझ इसी में है कि हम भीड़ का हिस्सा बनें, लेकिन अपनी मूल प्रवृत्ति को बनाए रखें और किसी भी तरह के दिखावे से खुद को दूर रखें।
क्योंकि अंत में फैसले भी हमारे होते हैं… और उनके परिणाम भी।

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