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भीड़ या समूह में इंसान का व्यवहार क्यों बदल जाता है? (Group Psychology)

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इंसान एक सामाजिक प्राणी है। जन्म लेते ही उसका समाज से जुड़ाव शुरू हो जाता है और ये रिश्ते समय और परिस्थितियों के साथ बनते-बिगड़ते रहते हैं। वह पूरी जिंदगी इन्हीं सामाजिक संबंधों और रिश्ते-नातों को निभाने की कोशिश करता रहता है। हम अलग-अलग तरीकों से समाज से जुड़े होते हैं और हमारे फैसलों पर भी समाज का असर साफ दिखाई देता है। सामाजिक प्राणी होने के नाते हम समाज के तौर-तरीकों से पूरी तरह अलग नहीं रह सकते और धीरे-धीरे खुद को उसके अनुसार ढालने लगते हैं। कई बार हमें ऐसे समारोहों या मौकों का हिस्सा बनना ही पड़ता है, जहां बड़ी संख्या में लोग मौजूद होते हैं—चाहे वह राजनीतिक सभा हो, प्रदर्शन हो, गोष्ठी, कवि सम्मेलन या कोई शादी-ब्याह। क्या आपने कभी महसूस किया है कि जैसे ही हम किसी भीड़ या बड़े समूह का हिस्सा बनते हैं, हमारा आचरण और व्यवहार बदलने लगता है? हम अपनी समझ को पीछे छोड़कर उसी तरह व्यवहार करने लगते हैं, जैसा बाकी लोग कर रहे होते हैं।   ऐसा लगता है जैसे भीड़ की सामूहिक मानसिकता ( Group Psychology ) धीरे-धीरे हमारे दिमाग पर हावी हो जाती है। हम रोजमर्रा की जिंदगी में भी यह अनुभव करते रहते ...