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नाथ संप्रदाय | नाथ पंथी | कनफटा योगी | Nath Sampradaya | Nath Panthis | Kanphata Yogi

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Painting of Gorakhnath  नाथ संप्रदाय एक ऐसा संप्रदाय है जो संपूर्ण भारत के गांव-गांव तक फैला हुआ है। लगभग हर गांव में नाथ योगियों एवं उनके आश्रमों को देखा जा सकता है। नाथ परंपरा हिंदू धर्म की शैव परंपरा से जुड़ी हुई है और यह मुख्यत: भारत और नेपाल से संबंधित है। वैसे नाथ संप्रदाय की जड़ें प्राचीन सिद्ध परंपरा में पाई जाती हैं। जब भी नाथ योगियों की बात की जाती है तो चौरासी सिद्ध एवं नव नाथ का उल्लेख होता है, और इस प्रकार नाथ और सिद्ध आपस में जुड़े हुए हैं। नाथ योगी भगवान शिव को अपना प्रथम गुरु मानते हैं और उन्हें आदिगुरु ( Adiguru ) कहते हैं। आदिगुरु के अलावा नव नाथ (नौ नाथ) भी नाथ योगियों के मुख्य गुरु माने जाते हैं, जिनमें 9 वीं शताब्दी के योगी मत्स्येंद्रनाथ प्रमुख हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में नाथ पंथ का जो वर्तमान विचार एवं संगठन है, उसकी नींव महायोगी गोरखनाथ द्वारा रखी गई थी, इसलिए गोरखनाथ को नाथ संप्रदाय का प्रमुख प्रवर्तक माना जाता है। योगी मत्स्येंद्रनाथ ( Yogi Matsyendranatha ) ऐसी मान्यता है कि जब नौका में बैठे भगवान शिव देवी पार्वती को तत्वज्ञान समझा रहे थे, तब पार्वती को ...

श्री अरविंद: एक क्रांतिकारी से दार्शनिक बनने का सफर | Sri Aurobindo: The Journey From a Revolutionary to a Philosopher | Sri Aurobindo Gosh

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Photo: Shri Aurobindo भारत की 20 वीं सदी महापुरुषों की सदी रही है और श्री अरविंद (Sri Aurobindo)  को भी उन्हीं महापुरुषों में गिना जाता है। सन 1872 में कलकत्ता में जन्मे अरविंद घोष का जीवन अत्यंत उतार-चढ़ाव वाला रहा है और उनकी पूरी जीवन-यात्रा विविधताओं से भरी हुई है। बचपन में अंग्रेजी माहौल में लालन-पालन और पढ़ाई-लिखाई से लेकर जवानी में भारतीय सिविल सेवा की कठिन परीक्षा पास करने तक, अरविंद ने जीवन के अनेक चरणों का अनुभव किया। उन्होंने भारत की आज़ादी से जुड़े कार्यों में अपना योगदान दिया और अंत में जीवन का एक लंबा समय अध्यात्म को समर्पित कर दिया। श्री अरविंद के व्यक्तित्व में योगी, कवि और दार्शनिक—तीनों का समन्वय नजर आता है। अरविंद को जेल क्यों जाना पड़ा? भारतीय सिविल सेवा से मोहभंग होने के बाद कुछ समय तक अरविंद ने बड़ौदा राज्य में अपनी सेवाएं दीं। अपनी राज्य-सेवाओं के दौरान ही वे राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ने लगे थे। सन् 1905 में बंगाल के विभाजन के विरोध में क्रांतिकारियों के समूह में अरविंद भी सक्रिय रूप से शामिल थे और वे अंग्रेजों की नजर में आ चुके थे। सन् 1908 में दो क्रां...

क्या दुनिया को आज बुद्ध की शिक्षाओं की जरूरत है? | Relevance of Buddha Teachings Today

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आज दुनिया जटिलता, तनाव और असमानताओं से घिरी हुई है। मध्य-पूर्व में चल रहा युद्ध यह दर्शाता है कि दुनिया में तकनीकी विकास तो बहुत हुआ है, परंतु मनुष्य के भीतर अशांति और असंतोष बढ़ता जा रहा है। ऐसे समय में यह प्रश्न उठता है—क्या बुद्ध की नीतिगत शिक्षाएँ दुनिया में शांति ला सकती हैं? बुद्ध के समय का समाज सिद्धार्थ का जन्म ऐसे समय में हुआ जब भारत छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यों में बंटा हुआ था। लोभ, लालच और असंतुष्टि के कारण ये राज्य आपस में युद्धरत रहते थे। धार्मिक दृष्टि से उस समय का समाज कर्मकांडों और पाखंडों में उलझा हुआ था। इस प्रकार की सामाजिक जटिलताओं के कारण आम मनुष्य स्वयं को तनावग्रस्त महसूस करता था और अपने जीवन के मार्ग से भटकता जा रहा था। ऐसे सामाजिक रूप से त्रस्त आमजन को शांति का मार्ग दिखाने के लिए सिद्धार्थ ने बुद्ध बनकर अपना नीतिगत दर्शन प्रस्तुत किया। बुद्ध की शिक्षाएँ बुद्ध ने मनुष्य को शांति का मार्ग दिखाने के लिए चार आर्य सत्य (The Four Noble Truths) बताए। उन्होंने कहा कि— जीवन में दुःख है। दुःख के कारण हैं। दुःख के कारणों का निवारण संभव है। इस निवारण के लिए अष्टांगिक मार्ग ...

सुकराती पद्धति: प्रश्नों के माध्यम से सत्य की खोज | Socratic Method: The Search for Truth Through Questions

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Photo: Socrates with his Deciples सुकराती पद्धति (Socratic Method) क्या है? सुकराती पद्धति, जिसका नाम प्राचीन यूनानी दार्शनिक सुकरात (Socrates) के नाम पर रखा गया है, एक ऐसी विधि है जिसमें प्रश्नों के माध्यम से विचारों की पड़ताल की जाती है और सत्य तक पहुँचने का प्रयास किया जाता है। सुकरात, जो 469 ईसा पूर्व से 399 ईसा पूर्व के बीच जीवित रहे, इस पद्धति का उपयोग जीवन, नैतिकता और ज्ञान जैसे गहन विषयों पर चर्चा करने के लिए करते थे। यह कैसे काम करती है? इस पद्धति में किसी एक विचार या विषय पर चर्चा शुरू की जाती है, जिसमें एक व्यक्ति लगातार दूसरे व्यक्ति से प्रश्न पूछता रहता है, जब तक कि किसी निष्कर्ष तक न पहुँचा जाए। एक उदाहरण मान लीजिए चर्चा का विषय “न्याय (Justice)” है। ऐसी स्थिति में एक व्यक्ति प्रश्न पूछता है: “न्याय क्या है?” दूसरा व्यक्ति इसका उत्तर अपनी समझ के अनुसार देता है। इसके बाद पहला व्यक्ति उस उत्तर पर फिर से प्रश्न उठाता है। यह प्रश्न-उत्तर की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है, जब तक कि “न्याय” की एक बेहतर और स्पष्ट परिभाषा सामने न आ जाए। सुकरात का प्रभाव सुकरात ने अपनी दार्शनिक विच...

क्या "मजबूरी का नाम महात्मा गांधी" एक सही कहावत है? | Is the saying "Majboori ka naam Mahatma Gandhi" really justified?

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Photo: Mahatma Gandhi महात्मा गांधी: संकोच से संकल्प तक मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को एक पारंपरिक गुजराती परिवार में हुआ था। अपने प्रारंभिक जीवन में गांधी अत्यंत संकोची और शर्मीले स्वभाव के थे। अपनी पुस्तक “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” में उन्होंने स्वीकार किया है कि सार्वजनिक सभाओं और भाषणों में अपनी झिझक को दूर करने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। लेकिन अपने दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने इस कमजोरी पर विजय प्राप्त की और आगे चलकर दक्षिण अफ्रीका तथा भारत में सत्याग्रहों और आंदोलनों के माध्यम से जनसमूह को संगठित करने में सफल हुए। प्रारंभिक जीवन और व्यक्तित्व इस पुस्तक से यह भी स्पष्ट होता है कि गांधी में अपनी इच्छाओं—विशेषकर भोजन और इंद्रिय-नियंत्रण—पर काबू रखने की असाधारण क्षमता थी। हिंदू दर्शन के अनुयायी होने के कारण वे कट्टर शाकाहारी थे और उन्होंने गंभीर बीमारी के समय भी अपने इस सिद्धांत से समझौता नहीं किया। जब उनकी पत्नी कस्तूरबा को बीमारी के दौरान उनकी अनुपस्थिति में डॉक्टर द्वारा मांस का सूप दिया गया, तो यह बात उन्हें गहराई से आहत कर गई। दक्षिण अफ्री...

आदि शंकराचार्य: हिन्दू धर्म के मसीहा | Adi Shankaracharya: The Great Philosopher of Hinduism

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Photo: A Statue of Adi Shankaracharya  भारत में आज सनातन धर्म का विस्तार जिस मुकाम पर दिखाई देता है, उसका श्रेय काफी हद तक आदि शंकर को दिया जाता है। शंकर को दुनिया जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के नाम से जानती है। आदि शंकराचार्य का जन्म ( Birth of Adi Shankaracharya ) शंकर का जन्म 788 ईस्वी में केरल के कालड़ी नामक गाँव में हुआ माना जाता है। हालांकि शंकराचार्य परंपरा से जुड़े कुछ विद्वानों का मत है कि उनका जन्म 507 ईसा पूर्व में हुआ था। उस समय की सामाजिक स्थिति ( Social Conditions of That Time ) शंकराचार्य के जन्म के समय भारत में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रभाव था। बौद्ध भिक्षु गाँव-गाँव घूमकर गौतम बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करते थे और सामान्य जन उनसे अत्यधिक प्रभावित होते थे। बौद्ध धर्म के इतने प्रभाव का एक प्रमुख कारण यह था कि उस समय हिंदू धर्म में कर्मकांड को अत्यधिक महत्व दिया जाने लगा था। सामान्य जन कर्मकांड से विशेष जुड़ाव महसूस नहीं करते थे, जबकि बुद्ध का नीतिपरक धर्म उन्हें सरल और पालन करने योग्य प्रतीत होता था। बौद्धों के प्रभाव का एक कारण यह भी था कि हिंदू धर्म की आड़ में पा...