श्री अरविंद: एक क्रांतिकारी से दार्शनिक बनने का सफर | Sri Aurobindo: The Journey From a Revolutionary to a Philosopher | Sri Aurobindo Gosh
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| Photo: Shri Aurobindo |
भारत की 20 वीं सदी महापुरुषों की सदी रही है और श्री अरविंद(Sri Aurobindo) को भी उन्हीं महापुरुषों में गिना जाता है।
सन 1872 में कलकत्ता में जन्मे अरविंद घोष का जीवन अत्यंत उतार-चढ़ाव वाला रहा है और उनकी पूरी जीवन-यात्रा विविधताओं से भरी हुई है।
बचपन में अंग्रेजी माहौल में लालन-पालन और पढ़ाई-लिखाई से लेकर जवानी में भारतीय सिविल सेवा की कठिन परीक्षा पास करने तक, अरविंद ने जीवन के अनेक चरणों का अनुभव किया। उन्होंने भारत की आज़ादी से जुड़े कार्यों में अपना योगदान दिया और अंत में जीवन का एक लंबा समय अध्यात्म को समर्पित कर दिया।
श्री अरविंद के व्यक्तित्व में योगी, कवि और दार्शनिक—तीनों का समन्वय नजर आता है।
अरविंद को जेल क्यों जाना पड़ा?
भारतीय सिविल सेवा से मोहभंग होने के बाद कुछ समय तक अरविंद ने बड़ौदा राज्य में अपनी सेवाएं दीं। अपनी राज्य-सेवाओं के दौरान ही वे राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ने लगे थे।
सन् 1905 में बंगाल के विभाजन के विरोध में क्रांतिकारियों के समूह में अरविंद भी सक्रिय रूप से शामिल थे और वे अंग्रेजों की नजर में आ चुके थे।
सन् 1908 में दो क्रांतिकारियों, खुदीराम बोस एवं प्रफुल्ला चाकी ने किंग्सफोर्ड नाम के एक अंग्रेज जज को बम से उड़ाने की योजना बनाई, परंतु उस बम धमाके में जज की जगह दो अंग्रेज महिलाओं की मृत्यु हो गई।
अंग्रेजों ने इस पूरी घटना को अलीपुर षड्यंत्र का नाम दिया और इसकी योजना तथा निगरानी के आरोप में अरविंद को भी गिरफ्तार कर अलीपुर जेल में डाल दिया।
अरविंद को लगभग एक वर्ष तक अलीपुर जेल में निर्जन कारावास में रखा गया।
जेल में आध्यात्मिक अनुभव एवं हृदय परिवर्तन
श्री अरविंद ने अपने साहित्य में उल्लेख किया है कि अलीपुर जेल में जब वे ध्यान में लीन थे, तब उन्हें भगवान श्री कृष्ण के दर्शन हुए।
उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने गहन ध्यान में स्वामी विवेकानंद की आवाज सुनी और लगातार पंद्रह दिनों तक उन्हें ऐसा अनुभव हुआ जैसे स्वामी जी उनसे संवाद कर रहे हों।
निर्जन कारावास ने श्री अरविंद के जीवन को पूर्णतः बदल दिया।
उन्होंने देश की सेवा और आज़ादी से ऊपर उठकर पूरी मानवता के कल्याण को ही अपना लक्ष्य बना लिया।
सन् 1909 में जेल से बाहर आने के बाद श्री अरविंद ने सभी प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों से स्वयं को अलग कर लिया। उन्होंने पांडिचेरी (वर्तमान पुडुचेरी) को अपना स्थायी निवास बनाया और वहां श्री अरविंद आश्रम की स्थापना की। सन् 1950 में अपना शरीर त्यागने तक वे पांडिचेरी आश्रम में ही रहे।
श्री अरविंद का योग, दर्शन और साहित्य
अलीपुर जेल के आध्यात्मिक अनुभवों के बाद श्री अरविंद ने समग्र योग (Integral Yoga) का दर्शन प्रस्तुत किया।
उन्होंने सावित्री (Savitri), द सिंथेसिस ऑफ योगा (The Synthesis of Yoga) एवं द लाइफ डिवाइन (The Life Divine) जैसे कई महत्वपूर्ण आध्यात्मिक ग्रंथों की रचना की।
श्री अरविंद के अनुसार, मानवता की वर्तमान अवस्था अंतिम नहीं है; बल्कि मनुष्य अभी एक संक्रमणशील अस्तित्व (evolutional Phase) में है, जो विकास की एक मध्यवर्ती अवस्था है। उसका उद्देश्य है कि वह आत्मा (Spirit) को प्रकट करे और अधिमानसिक चेतना (Supramental Consciousness) को अभिव्यक्त करते हुए पृथ्वी पर जीवन का रूपांतरण करे।
आज के समय में प्रासंगिकता
श्री अरविंद का दर्शन बताता है कि मनुष्य के भीतर एक दिव्य चेतना का वास है और ध्यान एवं योग के माध्यम से उसका साक्षात्कार किया जा सकता है।
श्री अरविंद के अनुसार, मनुष्य में अकल्पनीय संभावनाएं विद्यमान हैं, जिन्हें भौतिकता से ऊपर उठकर और ध्यान के माध्यम से स्वयं के भीतर खोजा जा सकता है।
मनुष्य हर काल में स्वयं को अधूरा और असंतुष्ट महसूस करता रहा है, इसलिए श्री अरविंद का दर्शन हमेशा ही प्रासंगिक बना रहेगा।
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