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कभी दुनिया का अजूबा थी... आज बदहाली का शिकार है: फतेहपुर शेखावाटी की 'नवाब अलफ खां की बावड़ी'

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2026 में फतेहपुर शेखावाटी बावड़ी की एक फोटो  फतेहपुर शेखावाटी कस्बा राजस्थान के हेरिटेज शहरों  में शुमार है और यहां की विश्व प्रसिद्ध वास्तुकला की वजह से इसे ' Open Art Gallery' भी कहा जाता है। पर क्या आप जानते हैं कि फतेहपुर शेखावाटी में मध्यकाल की वास्तु और स्थापत्य कला का एक ऐसा नमूना मौजूद है, जो किसी अजूबे से कम नहीं है। जी हां! हम बात कर रहे हैं फतेहपुर शेखावाटी की 'नवाब अलफ खां की बावड़ी'  ( Nawab Alaf Khan ki Bawri) की, जिसे सन् 1614 ईस्वी में नवाब अलफ खां के बेटे दौलत खां ने बनवाया था। यह बावड़ी शेखावाटी में 'नवाबी बावड़ी' के नाम से प्रसिद्ध है। The Famous Fatehpur Shekhawati Stepwell यह बावड़ी अपने आप में इतनी अनूठी थी कि इतिहासकारों ने इसे दुनिया के 17 अजूबों में शामिल किया था। फतेहपुर के बावड़ी गेट क्षेत्र का नाम भी इसी बावड़ी के नाम पर पड़ा है। फतेहपुर बावड़ी एक अजूबा कैसे थी? बावड़ी का निर्माण नागौर के एक कारीगर शेख महमूद द्वारा किया गया था। अंदर से इसका पूरा ढांचा एक भूल-भुलैया जैसा बनाया गया था। ऐसा कहा जाता है कि इसके अंदर से एक सुरंग का रास्...

छोटे शहरों की राजनीति: क्या विचारधारा से ज्यादा धन बल, स्थानीय प्रभाव और पहचान मायने रखते हैं?

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भारत में राजनीतिक पार्टियां अपने सांसद, विधायकों और स्थानीय स्तर पर पार्षदों को अपनी विचारधारा के बलबूते खुद से जोड़ क्यों नहीं पातीं? क्यों पार्टी का टिकट नहीं मिलने पर चुनावी उम्मीदवार दूसरी पार्टी से जुड़ जाते हैं? क्या राजनीतिक पार्टियां केवल विधायकों और सांसदों की संख्या गिनती हैं? अगर ऐसा नहीं है, तो क्यों विधायक एवं सांसद के स्तर पर पार्टियों की विचारधाराएं फीकी पड़ जाती हैं? क्या स्थानीय राजनीति में विचारधारा का महत्व कम हो रहा है। संसद और विधानसभा चुनावों में छोटे शहरों और कस्बों का ही योगदान होता है। यहां से चुने गए सांसद और विधायक ही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की सरकार बनाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि उन छोटे शहरों और कस्बों की राजनीति किस तरह काम करती है, जहां से बिना किसी विचारधारा के दम पर सांसद और विधायक चुनकर आते हैं और इनकी संख्या गिनकर पार्टियां अपनी विचारधारा की सरकार बना लेती हैं। विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं कौनसी हैं? जब से दुनिया में democracy की बात हो रही है, तभी से इसे लागू करने के विचार भी जन्म लेते रहे हैं। ये विचार...

क्या खेतड़ी (झुंझुनू) के महाराजा के बिना स्वामी विवेकानंद को दुनिया जान पाती? | Would the World Have Known Swami Vivekananda Without the Maharaja of Khetri (Jhunjhunu)

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Photo: Swami Vivekananda and Maharaja Ajit Singh of Khetri  पूरा विश्व आज स्वामी विवेकानंद के नाम से परिचित है। स्वामी विवेकानंद भारत के एक ऐसे युवा सन्यासी थे जिन्होंने हिंदू धर्म के विचारों को पूरी दुनिया में पहुंचाया। अमेरिका के शिकागो में हुए 'विश्व धर्म सम्मेलन' ( Parliament of the World's Religions ) में स्वामी विवेकानंद द्वारा जो व्याख्यान दिया गया था, उसने पूरी दुनिया को हिन्दू धर्म, भारतीय संस्कृति और सभ्यता से परिचित करवाया। पर क्या हम जानते हैं कि स्वामी विवेकानंद के जीवन और उनकी इन उपलब्धियों में राजस्थान के खेतड़ी (झुंझुनूं) के महाराजा अजीत सिंह का कितना बड़ा योगदान है? इस व्याख्यान के बाद स्वामी विवेकानंद भी पूरे विश्व में प्रसिद्ध हो गए। कौन थे खेतड़ी के महाराजा अजीत सिंह अजीत सिंह का जन्म सन् 1861 में झुंझुनू के अलसीसर में हुआ। सन् 1870 से लेकर 1901 तक उन्होंने खेतड़ी रियासत पर शासन किया। महाराजा अजीत सिंह कला एवं विज्ञान प्रेमी थे और खगोल विज्ञान का भी समझ रखते थे। स्वामी विवेकानंद को भी उन्होंने खगोल विज्ञान सिखाया था। वे बहुत ही काबिल शासक थे और उन्होंन...

फतेहपुर के दानवीर सेठ सोहनलाल दूगड़: जिन्हें दान किए बिना चैन नहीं मिलता था। | The Philanthropist Seth Sohanlal Dugar of Fatehpur: A Man Who Found No Peace Without Giving

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Photo: Sohanlal Lal Dugar ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो बिना किसी शोर-शराबे के समाज के लिए बहुत कुछ कर जाते हैं। बात करते हैं ऐसी ही  एक महान शख्सियत के बारे में, जिन्होंने जनसेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया। ये कोई नेता नहीं थे और न ही इनकी जनसेवा नेताओं जैसी थी। हम बात कर रहे हैं राजस्थान के सीकर जिले के फतेहपुर कस्बे के नामी सेठ सोहनलाल दूगड़ की। सेठ सोहनलाल दुगड़ का जन्म 20 जून 1895 को उस समय के सीकर ठिकाने के एक छोटे से कस्बे फतेहपुर में हुआ था। बचपन ( Childhood ) सोहनलाल का बचपन बड़ा अभावग्रस्त रहा। पैसों की तंगी के कारण कोई औपचारिक शिक्षा नहीं हो पाई और केवल पारंपरिक गुरुओं से ही थोड़ा-बहुत सीखा। गुरु शिक्षा में उनका अधिक मन नहीं लगता था और अधिक समय मोहल्ले के बालकों के साथ गुच्छी और चरभर (पारंपरिक खेल) खेलने में निकलता था। चरभर के खेल में पैसे भी लगाए और सट्टे से पैसे कमाने का लोभ जग गया। परिवार अभावग्रस्त था, इसलिए पैसों का लोभ स्वाभाविक था। एक-दो बार चरभर में पिताजी के पैसे हार गए, तो मार भी पड़ी। एक धनी परिवार के संपर्क में आकर वे कलकत्ता गए और कुछ हासिल किए बिना वाप...

क्या RSS का हिंदुत्व और हिन्दू धर्म एक ही हैं, या दोनों अलग है? | Are RSS Hindutva and Hinduism the same, or are they different?

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हिंदुत्व बनाम हिंदू धर्म   आइए एक छोटी सी कहानी से समझने कि कोशिश करते हैं कि आखिर हिन्दू धर्म और हिंदुत्व में क्या फर्क है। बबलू आज स्कूल से जल्दी आ गया था। मन को थोड़ा हल्का करने के लिए वह अपने मोहल्ले की चाय की थड़ी पर जाकर बैठ गया। लेकिन आज माहौल कुछ अलग था… थड़ी पर काफी गर्मा गर्मी थी। गरम सिंह और नरम सिंह के बीच तगड़ी बहस चल रही थी। गरम सिंह RSS के हिंदुत्व को लेकर अपनी बात रख रहा था, जबकि नरम सिंह हिन्दू धर्म की बात कर रहा था। दोनों की बातें सुनकर बबलू कन्फ्यूज हो गया। 🤔 उसके मन में सवाल उठा -- “RSS का हिंदुत्व और हिन्दू धर्म… क्या ये दोनों एक ही हैं?” बबलू अब दोनों की बात ध्यान से सुनने लगा। नरम सिंह कह रहा था -- मैं सनातनी हिन्दू हूं… हिन्दू धर्म के अनुसार जीवन जीने की कोशिश करता हूं। हिन्दू धर्म एक जीवन शैली है, और हिन्दू होना एक व्यक्तिगत मामला है। धर्म सामूहिक नहीं हो सकता, यह तो व्यक्तिगत मामला है। समूह का तो संप्रदाय होता है। मैं गीता, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र जैसे ग्रंथों को पढ़कर जीवन के गूढ़ प्रश्नों के उत्तर खोजने की कोशिश करता हूं। गरम सिंह अपनी बात जोर से रखता है ...

बबलू चला वोट डालने: क्या वह सच में लोकतंत्र को समझता है? | Bablu Goes to Vote: Does He Really Understand Democracy?

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भाईसाहब! आज लोकतंत्र का पर्व है… 🇮🇳 और बबलू पहली बार वोट डालने जा रहा है। उसे लग रहा है कि आज वह देश बदलने निकला है। अब बबलू अपने मोहल्ले के मतदान केंद्र की ओर बढ़ रहा है। उसके चेहरे पर उत्साह है… और मन में एक अजीब सा गर्व। रास्ते में उसे उसके क्षेत्र के एक पत्रकार महोदय मिल जाते हैं। पत्रकार मुस्कुराकर पूछते हैं -- “तुम्हारे इलाके की सबसे बड़ी समस्याएं क्या हैं?” बबलू बिना सोचे बोलना शुरू करता है -- “पानी की किल्लत है… नालियां रुकी हुई हैं… जगह-जगह जलभराव है… सड़कें भी टूटी हुई हैं…” पत्रकार फिर पूछते हैं -- “तो तुम किस पार्टी को वोट दोगे?” बबलू तुरंत जवाब देता है -- “बवंडर पार्टी को।” पत्रकार फिर पूछते हैं -- “क्यों? बवंडर पार्टी ही क्यों?” बबलू सहज होकर कहता है -- “हम तो हमेशा से उसी को वोट देते आए हैं… पापा भी उसी को देते हैं, भैया, बहन, मम्मी, चाचा-चाची… मेरे दादाजी और दादी भी इसी पार्टी को वोट देते आए हैं… और हमारे पड़ोसी भी सालों से इसी को वोट डालते आ रहे हैं। हमारा पूरा माहौल ही ऐसा है।” पत्रकार कुछ देर चुप रहते हैं, फिर गंभीर होकर पूछते हैं -- “क्या तुमने स्कूल में लोकतंत्र ...

क्या भारत में लोकतंत्र वास्तव में सफल है? | Is democracy truly successful in India?

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Photo: A Statue of B.R. Ambedkar क्या केवल वयस्क मताधिकार देने भर से लोकतंत्र का कार्य पूरा हो जाता है, या लोकतंत्र का कोई अधिक विकसित रूप भी हो सकता है? क्या भारत में हर एक मतदाता अपने मत की कीमत समझता है, या केवल बहकावे में आकर अपना मत कहीं भी उपयोग कर लेता है? क्या भारत में आम आदमी की आवाज़ सत्ता तक पहुंचती है, या उसके कीमती वोट का उपयोग केवल सत्ता हासिल करने के लिए किया जा रहा है? आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनकर उभर रहा है, पर क्या यहां लोकतंत्र वास्तव में सक्रिय है या केवल एक व्यवस्था बनकर रह गया है? लोकतंत्र क्या है? ( What is Democracy? ) लोकतंत्र का सामान्य अर्थ होता है— "जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए बनाया गया तंत्र"। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता ही सर्वोपरि होती है एवं जनता का ही शासन स्थापित किया जाता है। लोकतंत्र का शुद्ध रूप "प्रत्यक्ष लोकतंत्र" होता है, जिसमें सीधे जनता ही शासन एवं नीतियों से संबंधित निर्णय लेती है, परंतु व्यवहार में ज्यादातर लोकतंत्र की जो व्यवस्था अपनाई जाती है, वह "प्रतिनिधि लोकतंत्र" होती है। प्रतिनिधि...