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सुकरात: अपने विचारों से समझौते की बजाय ज़हर क्यों चुना?

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Photo: A Statue of Socrates क्या आप एक ऐसे व्यक्ति के बारे में जानते हैं जिसने अपनी सोच, अपने विचारों से समझौता करने की बजाय ज़हर पीकर खुशी-खुशी मौत को स्वीकार करना सही समझा? हम बात कर रहे हैं पश्चिम के एक महान दार्शनिक सुकरात (Socrates) की, जिसे पश्चिमी दर्शन का पिता कहा जाता है। कौन थे सुकरात? सुकरात का जन्म 469 ईसा पूर्व में प्राचीन ग्रीस की राजधानी एथेंस में हुआ था। प्राचीन एथेंस एक बहुत ही सुंदर शहर था, परंतु वहां जन्मे सुकरात को सुंदरता नसीब न थीं। सर पर लंबे बाल, ऊबड़-खाबड़ दाढ़ी, चपटी नाक और गोल-मटोल पेट वाले सुकरात छोटे कद के और मजबूत शरीर के थे। वे हमेशा नंगे पांव रहते थे और पूरे शरीर पर केवल एक लबादा ओढ़े रहते थे। सुकरात दिखने में भले ही कुरूप थे, लेकिन उनके जीवन और विचारों में सुंदरता की कोई सीमा नहीं थी। वे बुद्धिमान और चिंतनशील स्वभाव के एक सीधे-सादे व्यक्ति थे। एथेंस में सुकरात के खिलाफ कई तरह के आरोप लगे और इनके चलते अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। फोटो: सुकरात की एक मूर्ति  सुकरात के विचार क्या थे? सुकरात एक जिज्ञासु स्वभाव के व्यक्ति थे और किसी भी बात को गहराई स...

गुजरात में सोहन चिड़िया का ‘VIP’ चूज़ा: सुरक्षा में 50 अधिकारी और कर्मचारी तैनात

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सोहन चिड़िया का दुर्लभ फोटो  राजस्थान की दुर्लभ सोहन चिड़िया ( Great Indian Bustard ) दोस्तों, बचपन में सोहन चिड़िया की कहानी तो आप सभी ने सुनी होगी। पर क्या आपने सोहन चिड़िया का केवल नाम ही सुना है या इसे कभी देखा भी है? इसे देखना थोड़ा मुश्किल है क्योंकि यह बहुत दुर्लभ है और पूरे भारत में लगभग 150 के आसपास ही बची है। Gen-Z तो शायद सोहन चिड़िया से बिल्कुल भी परिचित नहीं होगा। Great Indian Bustard को राजस्थान में सोहन चिड़िया और गोडावण दोनों नामों से जाना जाता है। गुजरात में इसे घोराड़ भी कहा जाता है। यह लगभग एक मीटर लंबाई का एक भारी पक्षी होता है, जो प्रमुख रूप से राजस्थान में मिलता है। राजस्थान के अलावा यह गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी पाया जाता है। The Great Indian Bustard  गुजरात में लंबे समय बाद सोहन चिड़िया के चूज़े का जन्म सोहन चिड़िया को लुप्त होने से बचाने के लिए भारत सरकार द्वारा काफी प्रयास किए जा रहे हैं, जिसका ताजा उदाहरण हाल ही में गुजरात में देखने को मिला है। 26 मार्च 2026 को गुजरात के कच्छ के घास के मैदानों में दुर्लभ पक्षी सोहन चिड़िया ...

कभी दुनिया का अजूबा थी... आज बदहाली का शिकार है: फतेहपुर शेखावाटी की 'नवाब अलफ खां की बावड़ी'

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2026 में फतेहपुर शेखावाटी बावड़ी की एक फोटो  फतेहपुर शेखावाटी कस्बा राजस्थान के हेरिटेज शहरों  में शुमार है और यहां की विश्व प्रसिद्ध वास्तुकला की वजह से इसे ' Open Art Gallery' भी कहा जाता है। पर क्या आप जानते हैं कि फतेहपुर शेखावाटी में मध्यकाल की वास्तु और स्थापत्य कला का एक ऐसा नमूना मौजूद है, जो किसी अजूबे से कम नहीं है। जी हां! हम बात कर रहे हैं फतेहपुर शेखावाटी की 'नवाब अलफ खां की बावड़ी'  ( Nawab Alaf Khan ki Bawri) की, जिसे सन् 1614 ईस्वी में नवाब अलफ खां के बेटे दौलत खां ने बनवाया था। यह बावड़ी शेखावाटी में 'नवाबी बावड़ी' के नाम से प्रसिद्ध है। The Famous Fatehpur Shekhawati Stepwell यह बावड़ी अपने आप में इतनी अनूठी थी कि इतिहासकारों ने इसे दुनिया के 17 अजूबों में शामिल किया था। फतेहपुर के बावड़ी गेट क्षेत्र का नाम भी इसी बावड़ी के नाम पर पड़ा है। फतेहपुर बावड़ी एक अजूबा कैसे थी? बावड़ी का निर्माण नागौर के एक कारीगर शेख महमूद द्वारा किया गया था। अंदर से इसका पूरा ढांचा एक भूल-भुलैया जैसा बनाया गया था। ऐसा कहा जाता है कि इसके अंदर से एक सुरंग का रास्...

छोटे शहरों की राजनीति: क्या विचारधारा से ज्यादा धन बल, स्थानीय प्रभाव और पहचान मायने रखते हैं?

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भारत में राजनीतिक पार्टियां अपने सांसद, विधायकों और स्थानीय स्तर पर पार्षदों को अपनी विचारधारा के बलबूते खुद से जोड़ क्यों नहीं पातीं? क्यों पार्टी का टिकट नहीं मिलने पर चुनावी उम्मीदवार दूसरी पार्टी से जुड़ जाते हैं? क्या राजनीतिक पार्टियां केवल विधायकों और सांसदों की संख्या गिनती हैं? अगर ऐसा नहीं है, तो क्यों विधायक एवं सांसद के स्तर पर पार्टियों की विचारधाराएं फीकी पड़ जाती हैं? क्या स्थानीय राजनीति में विचारधारा का महत्व कम हो रहा है। संसद और विधानसभा चुनावों में छोटे शहरों और कस्बों का ही योगदान होता है। यहां से चुने गए सांसद और विधायक ही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की सरकार बनाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि उन छोटे शहरों और कस्बों की राजनीति किस तरह काम करती है, जहां से बिना किसी विचारधारा के दम पर सांसद और विधायक चुनकर आते हैं और इनकी संख्या गिनकर पार्टियां अपनी विचारधारा की सरकार बना लेती हैं। विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं कौनसी हैं? जब से दुनिया में democracy की बात हो रही है, तभी से इसे लागू करने के विचार भी जन्म लेते रहे हैं। ये विचार...

फतेहपुर के दानवीर सेठ सोहनलाल दूगड़: जिन्हें दान किए बिना चैन नहीं मिलता था। | The Philanthropist Seth Sohanlal Dugar of Fatehpur: A Man Who Found No Peace Without Giving

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Photo: Sohanlal Lal Dugar ऐसे बहुत से लोग होते हैं जो बिना किसी शोर-शराबे के समाज के लिए बहुत कुछ कर जाते हैं। बात करते हैं ऐसी ही  एक महान शख्सियत के बारे में, जिन्होंने जनसेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया। ये कोई नेता नहीं थे और न ही इनकी जनसेवा नेताओं जैसी थी। हम बात कर रहे हैं राजस्थान के सीकर जिले के फतेहपुर कस्बे के नामी सेठ सोहनलाल दूगड़ की। सेठ सोहनलाल दुगड़ का जन्म 20 जून 1895 को उस समय के सीकर ठिकाने के एक छोटे से कस्बे फतेहपुर में हुआ था। बचपन ( Childhood ) सोहनलाल का बचपन बड़ा अभावग्रस्त रहा। पैसों की तंगी के कारण कोई औपचारिक शिक्षा नहीं हो पाई और केवल पारंपरिक गुरुओं से ही थोड़ा-बहुत सीखा। गुरु शिक्षा में उनका अधिक मन नहीं लगता था और अधिक समय मोहल्ले के बालकों के साथ गुच्छी और चरभर (पारंपरिक खेल) खेलने में निकलता था। चरभर के खेल में पैसे भी लगाए और सट्टे से पैसे कमाने का लोभ जग गया। परिवार अभावग्रस्त था, इसलिए पैसों का लोभ स्वाभाविक था। एक-दो बार चरभर में पिताजी के पैसे हार गए, तो मार भी पड़ी। एक धनी परिवार के संपर्क में आकर वे कलकत्ता गए और कुछ हासिल किए बिना वाप...

बबलू चला वोट डालने: क्या वह सच में लोकतंत्र को समझता है? | Bablu Goes to Vote: Does He Really Understand Democracy?

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भाईसाहब! आज लोकतंत्र का पर्व है… 🇮🇳 और बबलू पहली बार वोट डालने जा रहा है। उसे लग रहा है कि आज वह देश बदलने निकला है। अब बबलू अपने मोहल्ले के मतदान केंद्र की ओर बढ़ रहा है। उसके चेहरे पर उत्साह है… और मन में एक अजीब सा गर्व। रास्ते में उसे उसके क्षेत्र के एक पत्रकार महोदय मिल जाते हैं। पत्रकार मुस्कुराकर पूछते हैं -- “तुम्हारे इलाके की सबसे बड़ी समस्याएं क्या हैं?” बबलू बिना सोचे बोलना शुरू करता है -- “पानी की किल्लत है… नालियां रुकी हुई हैं… जगह-जगह जलभराव है… सड़कें भी टूटी हुई हैं…” पत्रकार फिर पूछते हैं -- “तो तुम किस पार्टी को वोट दोगे?” बबलू तुरंत जवाब देता है -- “बवंडर पार्टी को।” पत्रकार फिर पूछते हैं -- “क्यों? बवंडर पार्टी ही क्यों?” बबलू सहज होकर कहता है -- “हम तो हमेशा से उसी को वोट देते आए हैं… पापा भी उसी को देते हैं, भैया, बहन, मम्मी, चाचा-चाची… मेरे दादाजी और दादी भी इसी पार्टी को वोट देते आए हैं… और हमारे पड़ोसी भी सालों से इसी को वोट डालते आ रहे हैं। हमारा पूरा माहौल ही ऐसा है।” पत्रकार कुछ देर चुप रहते हैं, फिर गंभीर होकर पूछते हैं -- “क्या तुमने स्कूल में लोकतंत्र ...

आदि शंकराचार्य: हिन्दू धर्म के मसीहा | Adi Shankaracharya: The Great Philosopher of Hinduism

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Photo: A Statue of Adi Shankaracharya  भारत में आज सनातन धर्म का विस्तार जिस मुकाम पर दिखाई देता है, उसका श्रेय काफी हद तक आदि शंकर को दिया जाता है। शंकर को दुनिया जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के नाम से जानती है। आदि शंकराचार्य का जन्म ( Birth of Adi Shankaracharya ) शंकर का जन्म 788 ईस्वी में केरल के कालड़ी नामक गाँव में हुआ माना जाता है। हालांकि शंकराचार्य परंपरा से जुड़े कुछ विद्वानों का मत है कि उनका जन्म 507 ईसा पूर्व में हुआ था। उस समय की सामाजिक स्थिति ( Social Conditions of That Time ) शंकराचार्य के जन्म के समय भारत में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रभाव था। बौद्ध भिक्षु गाँव-गाँव घूमकर गौतम बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करते थे और सामान्य जन उनसे अत्यधिक प्रभावित होते थे। बौद्ध धर्म के इतने प्रभाव का एक प्रमुख कारण यह था कि उस समय हिंदू धर्म में कर्मकांड को अत्यधिक महत्व दिया जाने लगा था। सामान्य जन कर्मकांड से विशेष जुड़ाव महसूस नहीं करते थे, जबकि बुद्ध का नीतिपरक धर्म उन्हें सरल और पालन करने योग्य प्रतीत होता था। बौद्धों के प्रभाव का एक कारण यह भी था कि हिंदू धर्म की आड़ में पा...