आदि शंकराचार्य: हिन्दू धर्म के मसीहा | Adi Shankaracharya: The Great Philosopher of Hinduism

Adi Shankaracharya
Photo: A Statue of Adi Shankaracharya 


भारत में आज सनातन धर्म का विस्तार जिस मुकाम पर दिखाई देता है, उसका श्रेय काफी हद तक आदि शंकर को दिया जाता है। शंकर को दुनिया जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के नाम से जानती है।

आदि शंकराचार्य का जन्म (Birth of Adi Shankaracharya)

शंकर का जन्म 788 ईस्वी में केरल के कालड़ी नामक गाँव में हुआ माना जाता है। हालांकि शंकराचार्य परंपरा से जुड़े कुछ विद्वानों का मत है कि उनका जन्म 507 ईसा पूर्व में हुआ था।

उस समय की सामाजिक स्थिति (Social Conditions of That Time)

शंकराचार्य के जन्म के समय भारत में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रभाव था। बौद्ध भिक्षु गाँव-गाँव घूमकर गौतम बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करते थे और सामान्य जन उनसे अत्यधिक प्रभावित होते थे।

बौद्ध धर्म के इतने प्रभाव का एक प्रमुख कारण यह था कि उस समय हिंदू धर्म में कर्मकांड को अत्यधिक महत्व दिया जाने लगा था। सामान्य जन कर्मकांड से विशेष जुड़ाव महसूस नहीं करते थे, जबकि बुद्ध का नीतिपरक धर्म उन्हें सरल और पालन करने योग्य प्रतीत होता था।

बौद्धों के प्रभाव का एक कारण यह भी था कि हिंदू धर्म की आड़ में पाखंड और रूढ़िवाद काफी फैल चुका था।

शिक्षा और संन्यास (Education and Renunciation)

ऐसा माना जाता है कि मात्र चार वर्ष की आयु में ही शंकर ने चारों वेदों और अन्य प्रमुख हिंदू शास्त्रों का अध्ययन कर लिया था। केवल आठ वर्ष की आयु में ही उन्होंने अपनी माता आर्यंभा से संन्यास की अनुमति लेकर गुरु गोविन्द भगवत्पाद की शरण ग्रहण की।


प्रमुख रचनाएँ और योगदान (Major Works and Contributions)

गुरु गोविन्द भगवत्पाद ने शंकर को हिंदू धर्म की प्राचीन और जर्जर होती जा रही पांडुलिपियों के पुनरुद्धार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी।

शंकर ने अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए प्रस्थांतरयी—अर्थात गीता, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र—पर महत्वपूर्ण भाष्य लिखे। महान हिंदू ग्रंथों पर भाष्य लिखने के कारण उन्हें आचार्य की उपाधि प्राप्त हुई और वे शंकराचार्य कहलाए।

शंकर ने विवेकचूडामणि, आनंदलहरी तथा भजगोविन्दम् जैसे प्रसिद्ध ग्रंथों की रचना की, जो आज भी भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

अद्वैत वेदांत का प्रसार (Spread of Advaita Vedanta)

संपूर्ण भारत में भ्रमण करते हुए शंकराचार्य ने अनेक शास्त्रार्थ किए और अद्वैत वेदांत को एक व्यवस्थित दर्शन के रूप में स्थापित किया।

चार मठों की स्थापना (Establishment of Four 'Maths')

सनातन धर्म को संस्थागत रूप देने के उद्देश्य से शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना की—

उत्तर में ज्योतिर्मठ,

पूर्व में गोवर्धन मठ,

दक्षिण में श्रृंगेरी मठ,

और पश्चिम में शारदा मठ।


शंकराचार्य द्वारा स्थापित ये चारों मठ आज भी भारत में सनातन धर्म की प्रमुख संस्थाओं के रूप में माने जाते हैं और विश्वभर में इसकी परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं।


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