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पूंजीवाद और उसका ‘बुरा भाई’ क्रोनी कैपिटलिज्म | Capitalism and it's 'Bad brother' Crony Capitalism

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पूंजीवाद क्या है? पूंजीवाद एक आर्थिक व्यवस्था है जिसे आज दुनिया के कई देशों ने अपनाया हुआ है। इस विचार को Adam Smith, एक स्कॉटिश अर्थशास्त्री और दार्शनिक, ने विकसित किया था। इस व्यवस्था में उत्पादन के साधनों (means of production) का स्वामित्व और नियंत्रण निजी व्यक्तियों या व्यवसायिक संस्थाओं के पास होता है, और उनका मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना होता है। इस प्रणाली में विभिन्न व्यवसाय अधिक से अधिक लाभ कमाने के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिससे नवाचार और संसाधनों का कुशल उपयोग बढ़ता है। पूंजीवादी व्यवस्था की विशेषताएँ पूंजीवादी समाज की एक प्रमुख विशेषता है — सीमित सरकार (Limited Government)। इसका अर्थ है कि सरकार का हस्तक्षेप व्यापारिक गतिविधियों में कम से कम होता है, जिससे व्यवसायों को अधिक स्वतंत्रता मिलती है। यह प्रणाली किसी भी देश के विकास के लिए उपयोगी हो सकती है, बशर्ते कि इसके दोनों प्रमुख पक्ष — सरकार और व्यवसायी — अपनी-अपनी भूमिका ईमानदारी और निष्पक्षता से निभाए। जब पूंजीवाद बिगड़ जाता है दुर्भाग्यवश, व्यवहार में ऐसा अक्सर नहीं होता। जब सरकार और व्यवसायी एक-दूसरे को अनुचित...

सुकराती पद्धति: प्रश्नों के माध्यम से सत्य की खोज | Socratic Method: The Search for Truth Through Questions

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Photo: Socrates with his Deciples सुकराती पद्धति (Socratic Method) क्या है? सुकराती पद्धति, जिसका नाम प्राचीन यूनानी दार्शनिक सुकरात (Socrates) के नाम पर रखा गया है, एक ऐसी विधि है जिसमें प्रश्नों के माध्यम से विचारों की पड़ताल की जाती है और सत्य तक पहुँचने का प्रयास किया जाता है। सुकरात, जो 469 ईसा पूर्व से 399 ईसा पूर्व के बीच जीवित रहे, इस पद्धति का उपयोग जीवन, नैतिकता और ज्ञान जैसे गहन विषयों पर चर्चा करने के लिए करते थे। यह कैसे काम करती है? इस पद्धति में किसी एक विचार या विषय पर चर्चा शुरू की जाती है, जिसमें एक व्यक्ति लगातार दूसरे व्यक्ति से प्रश्न पूछता रहता है, जब तक कि किसी निष्कर्ष तक न पहुँचा जाए। एक उदाहरण मान लीजिए चर्चा का विषय “न्याय (Justice)” है। ऐसी स्थिति में एक व्यक्ति प्रश्न पूछता है: “न्याय क्या है?” दूसरा व्यक्ति इसका उत्तर अपनी समझ के अनुसार देता है। इसके बाद पहला व्यक्ति उस उत्तर पर फिर से प्रश्न उठाता है। यह प्रश्न-उत्तर की प्रक्रिया लगातार चलती रहती है, जब तक कि “न्याय” की एक बेहतर और स्पष्ट परिभाषा सामने न आ जाए। सुकरात का प्रभाव सुकरात ने अपनी दार्शनिक विच...

क्या "मजबूरी का नाम महात्मा गांधी" एक सही कहावत है? | Is the saying "Majboori ka naam Mahatma Gandhi" really justified?

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Photo: Mahatma Gandhi महात्मा गांधी: संकोच से संकल्प तक मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को एक पारंपरिक गुजराती परिवार में हुआ था। अपने प्रारंभिक जीवन में गांधी अत्यंत संकोची और शर्मीले स्वभाव के थे। अपनी पुस्तक “सत्य के साथ मेरे प्रयोग” में उन्होंने स्वीकार किया है कि सार्वजनिक सभाओं और भाषणों में अपनी झिझक को दूर करने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा। लेकिन अपने दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति के बल पर उन्होंने इस कमजोरी पर विजय प्राप्त की और आगे चलकर दक्षिण अफ्रीका तथा भारत में सत्याग्रहों और आंदोलनों के माध्यम से जनसमूह को संगठित करने में सफल हुए। प्रारंभिक जीवन और व्यक्तित्व इस पुस्तक से यह भी स्पष्ट होता है कि गांधी में अपनी इच्छाओं—विशेषकर भोजन और इंद्रिय-नियंत्रण—पर काबू रखने की असाधारण क्षमता थी। हिंदू दर्शन के अनुयायी होने के कारण वे कट्टर शाकाहारी थे और उन्होंने गंभीर बीमारी के समय भी अपने इस सिद्धांत से समझौता नहीं किया। जब उनकी पत्नी कस्तूरबा को बीमारी के दौरान उनकी अनुपस्थिति में डॉक्टर द्वारा मांस का सूप दिया गया, तो यह बात उन्हें गहराई से आहत कर गई। दक्षिण अफ्री...

आदि शंकराचार्य: हिन्दू धर्म के मसीहा | Adi Shankaracharya: The Great Philosopher of Hinduism

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Photo: A Statue of Adi Shankaracharya  भारत में आज सनातन धर्म का विस्तार जिस मुकाम पर दिखाई देता है, उसका श्रेय काफी हद तक आदि शंकर को दिया जाता है। शंकर को दुनिया जगद्गुरु आदि शंकराचार्य के नाम से जानती है। आदि शंकराचार्य का जन्म ( Birth of Adi Shankaracharya ) शंकर का जन्म 788 ईस्वी में केरल के कालड़ी नामक गाँव में हुआ माना जाता है। हालांकि शंकराचार्य परंपरा से जुड़े कुछ विद्वानों का मत है कि उनका जन्म 507 ईसा पूर्व में हुआ था। उस समय की सामाजिक स्थिति ( Social Conditions of That Time ) शंकराचार्य के जन्म के समय भारत में बौद्ध धर्म का व्यापक प्रभाव था। बौद्ध भिक्षु गाँव-गाँव घूमकर गौतम बुद्ध की शिक्षाओं का प्रचार-प्रसार करते थे और सामान्य जन उनसे अत्यधिक प्रभावित होते थे। बौद्ध धर्म के इतने प्रभाव का एक प्रमुख कारण यह था कि उस समय हिंदू धर्म में कर्मकांड को अत्यधिक महत्व दिया जाने लगा था। सामान्य जन कर्मकांड से विशेष जुड़ाव महसूस नहीं करते थे, जबकि बुद्ध का नीतिपरक धर्म उन्हें सरल और पालन करने योग्य प्रतीत होता था। बौद्धों के प्रभाव का एक कारण यह भी था कि हिंदू धर्म की आड़ में पा...