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सुकरात: अपने विचारों से समझौते की बजाय ज़हर क्यों चुना?

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Photo: A Statue of Socrates क्या आप एक ऐसे व्यक्ति के बारे में जानते हैं जिसने अपनी सोच, अपने विचारों से समझौता करने की बजाय ज़हर पीकर खुशी-खुशी मौत को स्वीकार करना सही समझा? हम बात कर रहे हैं पश्चिम के एक महान दार्शनिक सुकरात (Socrates) की, जिसे पश्चिमी दर्शन का पिता कहा जाता है। कौन थे सुकरात? सुकरात का जन्म 469 ईसा पूर्व में प्राचीन ग्रीस की राजधानी एथेंस में हुआ था। प्राचीन एथेंस एक बहुत ही सुंदर शहर था, परंतु वहां जन्मे सुकरात को सुंदरता नसीब न थीं। सर पर लंबे बाल, ऊबड़-खाबड़ दाढ़ी, चपटी नाक और गोल-मटोल पेट वाले सुकरात छोटे कद के और मजबूत शरीर के थे। वे हमेशा नंगे पांव रहते थे और पूरे शरीर पर केवल एक लबादा ओढ़े रहते थे। सुकरात दिखने में भले ही कुरूप थे, लेकिन उनके जीवन और विचारों में सुंदरता की कोई सीमा नहीं थी। वे बुद्धिमान और चिंतनशील स्वभाव के एक सीधे-सादे व्यक्ति थे। एथेंस में सुकरात के खिलाफ कई तरह के आरोप लगे और इनके चलते अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। फोटो: सुकरात की एक मूर्ति  सुकरात के विचार क्या थे? सुकरात एक जिज्ञासु स्वभाव के व्यक्ति थे और किसी भी बात को गहराई स...

छोटे शहरों की राजनीति: क्या विचारधारा से ज्यादा धन बल, स्थानीय प्रभाव और पहचान मायने रखते हैं?

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भारत में राजनीतिक पार्टियां अपने सांसद, विधायकों और स्थानीय स्तर पर पार्षदों को अपनी विचारधारा के बलबूते खुद से जोड़ क्यों नहीं पातीं? क्यों पार्टी का टिकट नहीं मिलने पर चुनावी उम्मीदवार दूसरी पार्टी से जुड़ जाते हैं? क्या राजनीतिक पार्टियां केवल विधायकों और सांसदों की संख्या गिनती हैं? अगर ऐसा नहीं है, तो क्यों विधायक एवं सांसद के स्तर पर पार्टियों की विचारधाराएं फीकी पड़ जाती हैं? क्या स्थानीय राजनीति में विचारधारा का महत्व कम हो रहा है। संसद और विधानसभा चुनावों में छोटे शहरों और कस्बों का ही योगदान होता है। यहां से चुने गए सांसद और विधायक ही विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की सरकार बनाने के लिए जिम्मेदार होते हैं। ऐसे में यह जानना बेहद जरूरी हो जाता है कि उन छोटे शहरों और कस्बों की राजनीति किस तरह काम करती है, जहां से बिना किसी विचारधारा के दम पर सांसद और विधायक चुनकर आते हैं और इनकी संख्या गिनकर पार्टियां अपनी विचारधारा की सरकार बना लेती हैं। विभिन्न राजनीतिक विचारधाराएं कौनसी हैं? जब से दुनिया में democracy की बात हो रही है, तभी से इसे लागू करने के विचार भी जन्म लेते रहे हैं। ये विचार...

बबलू चला वोट डालने: क्या वह सच में लोकतंत्र को समझता है? | Bablu Goes to Vote: Does He Really Understand Democracy?

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भाईसाहब! आज लोकतंत्र का पर्व है… 🇮🇳 और बबलू पहली बार वोट डालने जा रहा है। उसे लग रहा है कि आज वह देश बदलने निकला है। अब बबलू अपने मोहल्ले के मतदान केंद्र की ओर बढ़ रहा है। उसके चेहरे पर उत्साह है… और मन में एक अजीब सा गर्व। रास्ते में उसे उसके क्षेत्र के एक पत्रकार महोदय मिल जाते हैं। पत्रकार मुस्कुराकर पूछते हैं -- “तुम्हारे इलाके की सबसे बड़ी समस्याएं क्या हैं?” बबलू बिना सोचे बोलना शुरू करता है -- “पानी की किल्लत है… नालियां रुकी हुई हैं… जगह-जगह जलभराव है… सड़कें भी टूटी हुई हैं…” पत्रकार फिर पूछते हैं -- “तो तुम किस पार्टी को वोट दोगे?” बबलू तुरंत जवाब देता है -- “बवंडर पार्टी को।” पत्रकार फिर पूछते हैं -- “क्यों? बवंडर पार्टी ही क्यों?” बबलू सहज होकर कहता है -- “हम तो हमेशा से उसी को वोट देते आए हैं… पापा भी उसी को देते हैं, भैया, बहन, मम्मी, चाचा-चाची… मेरे दादाजी और दादी भी इसी पार्टी को वोट देते आए हैं… और हमारे पड़ोसी भी सालों से इसी को वोट डालते आ रहे हैं। हमारा पूरा माहौल ही ऐसा है।” पत्रकार कुछ देर चुप रहते हैं, फिर गंभीर होकर पूछते हैं -- “क्या तुमने स्कूल में लोकतंत्र ...